अध्याय 10 · विभूति योग · श्रीकृष्ण कहते हैं
गीता अध्याय 10, श्लोक 9 — भक्तों का आनंद
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्। कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥
maccittā madgataprāṇā bodhayantaḥ parasparam | kathayantaśca māṃ nityaṃ tuṣyanti ca ramanti ca ||
अर्थ
उनका मन मुझमें लगा रहता है और उनका जीवन मुझे अर्पित होता है। वे एक-दूसरे को मेरे बारे में समझाते हैं, मेरी ही चर्चा करते हैं और उसी में संतोष व आनंद पाते हैं।
आज के जीवन में
सत्संग और कीर्तन में भक्ति वाले लोगों के साथ समय बिताने से भक्ति जीवित और आनंदमय रहती है।