अध्याय 11 · विश्वरूपदर्शन योग · श्रीकृष्ण कहते हैं
गीता अध्याय 11, श्लोक 33 — केवल निमित्त बनो
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्। मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥
tasmāttvamuttiṣṭha yaśo labhasva jitvā śatrūn bhuṅkṣva rājyaṃ samṛddham | mayaivaite nihatāḥ pūrvameva nimittamātraṃ bhava savyasācin ||
अर्थ
इसलिए उठो और यश पाओ; शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य का भोग करो। ये सब तो मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं; हे सव्यसाची, तुम बस निमित्त बन जाओ।
आज के जीवन में
पूरी लगन से अपना काम करें, पर स्वयं को बड़ी योजना का मालिक नहीं, एक निमित्त मानें।