अध्याय 12 · भक्ति योग · श्रीकृष्ण कहते हैं

गीता अध्याय 12, श्लोक 19 — निंदा-स्तुति में स्थिर

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्। अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥

tulyanindāstutirmaunī santuṣṭo yena kenacit | aniketaḥ sthiramatirbhaktimānme priyo naraḥ ||

अर्थ

जो निंदा और प्रशंसा को एक जैसा मानता है, कम बोलता है, जो मिले उसी में संतुष्ट है, किसी घर से बँधा नहीं है, और स्थिर बुद्धि वाला भक्त है — वह मनुष्य मुझे प्रिय है।

आज के जीवन में

सोशल मीडिया की तारीफ़ या आलोचना को अपने मन पर हावी न होने देना इस श्लोक को आज जीने का तरीका है।

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