अध्याय 13 · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभाग योग · श्रीकृष्ण कहते हैं
गीता अध्याय 13, श्लोक 33 — आकाश की तरह निर्लिप्त
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते। सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥
yathā sarvagataṃ saukṣmyādākāśaṃ nopalipyate | sarvatrāvasthito dehe tathātmā nopalipyate ||
अर्थ
जैसे सब जगह फैला आकाश सूक्ष्म होने के कारण किसी चीज़ से लिप्त नहीं होता, वैसे ही शरीर में हर जगह स्थित आत्मा कभी लिप्त नहीं होती।
आज के जीवन में
जैसे आकाश बादलों के बीच भी साफ़ रहता है, वैसे ही आपकी सच्ची आत्मा आती-जाती परेशानियों से अछूती रहती है।