अध्याय 14 · गुणत्रयविभाग योग · श्रीकृष्ण कहते हैं
गीता अध्याय 14, श्लोक 22 — न द्वेष, न चाह
श्रीभगवानुवाच। प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव। न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥
śrībhagavānuvāca | prakāśaṃ ca pravṛttiṃ ca mohameva ca pāṇḍava | na dveṣṭi sampravṛttāni na nivṛttāni kāṅkṣati ||
अर्थ
श्रीकृष्ण कहते हैं: ऐसा व्यक्ति प्रकाश (सत्त्व), प्रवृत्ति (रज) और मोह (तम) के आने पर उनसे द्वेष नहीं करता, और उनके चले जाने पर उनकी चाह नहीं करता।