अध्याय 15 · पुरुषोत्तम योग · श्रीकृष्ण कहते हैं

गीता अध्याय 15, श्लोक 4 — आदि पुरुष की शरण

ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः। तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये। यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥

tataḥ padaṃ tatparimārgitavyaṃ yasmingatā na nivartanti bhūyaḥ | tameva cādyaṃ puruṣaṃ prapadye | yataḥ pravṛttiḥ prasṛtā purāṇī ||

अर्थ

फिर उस परम पद को खोजना चाहिए, जहाँ जाकर कोई लौटता नहीं। 'मैं उसी आदि पुरुष की शरण में हूँ, जिससे यह पुराना संसार-प्रवाह चला है' — इस भाव से।

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