अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभाग योग · श्रीकृष्ण कहते हैं
गीता अध्याय 16, श्लोक 15 — अज्ञान का घमंड
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया। यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥
āḍhyo'bhijanavānasmi ko'nyo'sti sadṛśo mayā | yakṣye dāsyāmi modiṣya ityajñānavimohitāḥ ||
अर्थ
'मैं धनी हूँ, ऊँचे कुल का हूँ, मेरे बराबर कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा, मौज करूँगा' — अज्ञान से मोहित लोग ऐसा सोचते हैं।