अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभाग योग · श्रीकृष्ण कहते हैं

गीता अध्याय 16, श्लोक 18 — भीतर के ईश्वर से द्वेष

अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः। मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥

ahaṃkāraṃ balaṃ darpaṃ kāmaṃ krodhaṃ ca saṃśritāḥ | māmātmaparadeheṣu pradviṣanto'bhyasūyakāḥ ||

अर्थ

अहंकार, बल, घमंड, काम और क्रोध के सहारे जीने वाले ये ईर्ष्यालु लोग अपने और दूसरों के शरीर में बसे मुझ परमात्मा से द्वेष करते हैं।

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