अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभाग योग · श्रीकृष्ण कहते हैं

गीता अध्याय 16, श्लोक 22 — तीनों से मुक्ति

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः। आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम् ॥

etairvimuktaḥ kaunteya tamodvāraistribhirnaraḥ | ācaratyātmanaḥ śreyastato yāti parāṃ gatim ||

अर्थ

हे कौन्तेय, अंधकार के इन तीन द्वारों से छूटा हुआ मनुष्य अपने कल्याण का आचरण करता है और फिर परम गति को पाता है।

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