अध्याय 18 · मोक्षसंन्यास योग · श्रीकृष्ण कहते हैं
गीता अध्याय 18, श्लोक 14 — पाँचों कारण
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥
adhiṣṭhānaṃ tathā kartā karaṇaṃ ca pṛthagvidham | vividhāśca pṛthakceṣṭā daivaṃ caivātra pañcamam ||
अर्थ
शरीर (आधार), कर्ता, अलग-अलग इंद्रियाँ, तरह-तरह की चेष्टाएँ, और पाँचवाँ दैव (ईश्वरीय विधान)।