अध्याय 3 · कर्म योग · श्रीकृष्ण कहते हैं

गीता अध्याय 3, श्लोक 25 — ज्ञानी निःस्वार्थ कर्म करे

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत। कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥

saktāḥ karmaṇyavidvāṃso yathā kurvanti bhārata | kuryādvidvāṃstathāsaktaścikīrṣurlokasaṃgraham ||

अर्थ

हे भारत, जैसे अज्ञानी आसक्त होकर कर्म करते हैं, वैसे ही ज्ञानी को आसक्ति छोड़कर लोक-कल्याण के लिए कर्म करना चाहिए।

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