अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यास योग · श्रीकृष्ण कहते हैं

गीता अध्याय 4, श्लोक 35 — सबको अपने में देखना

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव। येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि (var अशेषाणि) ॥

yajjñātvā na punarmohamevaṃ yāsyasi pāṇḍava | yena bhūtānyaśeṣāṇi drakṣyasyātmanyatho mayi ||

अर्थ

हे पांडव, इसे जानकर तुम फिर ऐसे मोह में नहीं पड़ोगे। इससे तुम सभी प्राणियों को अपने में और फिर मुझमें देखोगे।

इस बारे में कुछ पूछें

पढ़ने की सेटिंग

रंग

अक्षर का आकार