अध्याय 6 · आत्मसंयम योग · श्रीकृष्ण कहते हैं

गीता अध्याय 6, श्लोक 1 — सच्चा संन्यासी और योगी

श्रीभगवानुवाच। अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः। स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥

śrībhagavānuvāca | anāśritaḥ karmaphalaṃ kāryaṃ karma karoti yaḥ | sa saṃnyāsī ca yogī ca na niragnirna cākriyaḥ ||

अर्थ

श्रीकृष्ण कहते हैं — जो कर्म के फल का सहारा लिए बिना अपना कर्तव्य कर्म करता है, वही संन्यासी है और वही योगी। केवल अग्नि (यज्ञ) छोड़ देने वाला या कर्म छोड़ देने वाला संन्यासी नहीं होता।

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