अध्याय 7 · ज्ञानविज्ञान योग · श्रीकृष्ण कहते हैं
गीता अध्याय 7, श्लोक 14 — शरण से माया पार
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥
daivī hyeṣā guṇamayī mama māyā duratyayā | māmeva ye prapadyante māyāmetāṃ taranti te ||
अर्थ
मेरी यह गुणों से बनी दैवी माया बहुत कठिनाई से पार होती है। पर जो मेरी शरण में आते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं।
आज के जीवन में
जब भ्रम और उलझन अपने बल से न सुलझें, तो विनम्र होकर भगवान की शरण लें — समर्पण से रास्ता साफ़ दिखने लगता है।