लवथवती विक्राळा शंकर आरती — अर्थ सहित
यह भगवान शंकर की सबसे लोकप्रिय मराठी आरती है, जिसे संत समर्थ रामदास स्वामी ने रचा। इसमें शिव के भयंकर पर सुंदर रूप, सिर पर गंगा, नीले कंठ और समुद्र मंथन में विष पीने की कथा का वर्णन है। महाराष्ट्र में गणेशोत्सव, सोमवार और महाशिवरात्रि पर यह 'सुखकर्ता दुखहर्ता' के साथ गाई जाती है।
लवथवती विक्राळा ब्रह्मांडीं माळा। वीषें कंठ काळा त्रिनेत्रीं ज्वाळा॥ लावण्यसुंदर मस्तकीं बाळा। तेथुनियां जळ निर्मळ वाहे झुळझुळां॥१॥
जय देव जय देव जय श्रीशंकरा। आरती ओवाळूं तुज कर्पूरगौरा॥ धृ.॥
कर्पूरगौरा भोळा नयनीं विशाळा। अर्धांगी पार्वती सुमनांच्या माळा॥ विभुतीचें उधळण शितिकंठ नीळा। ऐसा शंकर शोभे उमावेल्हाळा॥२॥
देवीं दैत्यीं सागरमंथन पैं केलें। त्यामाजीं अवचित हळाहळ जें उठिलें॥ तें त्वां असुरपणें प्राशन केलें। नीळकंठ नाम प्रसिद्ध झालें॥३॥
व्याघ्रांबर फणिवरधर सुंदर मदनारी। पंचानन मनमोहन मुनिजनसुखकारी॥ शतकोटीचें बीज वाचे उच्चारी। रघुकुळटिळक रामदासा अंतरीं॥४॥
अर्थ
पद 1
लवथवती विक्राळा ब्रह्मांडीं माळा। वीषें कंठ काळा त्रिनेत्रीं ज्वाळा॥ लावण्यसुंदर मस्तकीं बाळा। तेथुनियां जळ निर्मळ वाहे झुळझुळां॥१॥
शिव का रूप विशाल और भयंकर है, पूरा ब्रह्मांड उनके गले की माला जैसा है। विष से उनका कंठ काला है और तीसरे नेत्र में ज्वाला है। उनके सिर पर सुंदर गंगा विराजती हैं, जहाँ से निर्मल जल कल-कल बहता है।
पद 2
जय देव जय देव जय श्रीशंकरा। आरती ओवाळूं तुज कर्पूरगौरा॥ धृ.॥
हे देव, हे श्री शंकर, आपकी जय हो। हे कपूर जैसे गोरे प्रभु, हम आपकी आरती उतारते हैं।
पद 3
कर्पूरगौरा भोळा नयनीं विशाळा। अर्धांगी पार्वती सुमनांच्या माळा॥ विभुतीचें उधळण शितिकंठ नीळा। ऐसा शंकर शोभे उमावेल्हाळा॥२॥
कपूर जैसे गोरे, भोले, बड़ी आँखों वाले शिव के आधे अंग में पार्वती हैं और गले में फूलों की मालाएँ हैं। शरीर पर भस्म बिखरी है और कंठ नीला है — उमा के प्रिय शंकर ऐसे शोभते हैं।
पद 4
देवीं दैत्यीं सागरमंथन पैं केलें। त्यामाजीं अवचित हळाहळ जें उठिलें॥ तें त्वां असुरपणें प्राशन केलें। नीळकंठ नाम प्रसिद्ध झालें॥३॥
देवताओं और दैत्यों ने समुद्र मंथन किया, तब उसमें से अचानक हलाहल विष निकला। आपने बड़े साहस से वह विष पी लिया, और तभी से आपका नाम 'नीलकंठ' प्रसिद्ध हुआ।
पद 5
व्याघ्रांबर फणिवरधर सुंदर मदनारी। पंचानन मनमोहन मुनिजनसुखकारी॥ शतकोटीचें बीज वाचे उच्चारी। रघुकुळटिळक रामदासा अंतरीं॥४॥
बाघ की खाल पहने, नागों को धारण किए, सुंदर, कामदेव के शत्रु, पाँच मुख वाले, मन मोहने वाले शिव मुनियों को सुख देते हैं। वे सौ करोड़ श्लोकों वाली रामकथा का बीज — राम नाम — जपते हैं; रघुकुल के तिलक श्रीराम रामदास के हृदय में बसते हैं।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'लवथवती विक्राळा' किसने लिखी?
यह आरती 17वीं सदी के महाराष्ट्र के संत समर्थ रामदास स्वामी की रचना मानी जाती है; अंतिम पंक्ति में उनका नाम आता है।
यह आरती किस भाषा में है?
यह मराठी में है। अर्थ समझने के लिए हर पद का सरल हिंदी और अंग्रेज़ी अर्थ ऊपर दिया गया है।
यह आरती कब गाई जाती है?
सोमवार की शिव पूजा, महाशिवरात्रि और श्रावण में; महाराष्ट्र में गणेशोत्सव की आरती में भी यह गणेश आरती के बाद गाई जाती है।