शिव चालीसा — अर्थ सहित

शिव चालीसा भगवान शिव की चालीस चौपाइयों वाली प्रसिद्ध स्तुति है। अंतिम चौपाई में रचयिता के रूप में अयोध्यादास जी का नाम आता है। इसमें शिव जी के रूप, उनकी कृपा और भक्तों की रक्षा की कथाएँ हैं। सोमवार, प्रदोष, सावन और महाशिवरात्रि पर इसका पाठ विशेष रूप से किया जाता है।

41 चौपाई, 3 दोहे · लगभग 10 मिनट

॥ दोहा ॥

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान। कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान॥

॥ चौपाई ॥

जय गिरिजा पति दीन दयाला। सदा करत सन्तन प्रतिपाला॥

॥ चौपाई ॥

भाल चन्द्रमा सोहत नीके। कानन कुण्डल नागफनी के॥

॥ चौपाई ॥

अंग गौर शिर गंग बहाये। मुण्डमाल तन क्षार लगाये॥

॥ चौपाई ॥

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे। छवि को देखि नाग मन मोहे॥

॥ चौपाई ॥

मैना मातु की हवे दुलारी। बाम अंग सोहत छवि न्यारी॥

॥ चौपाई ॥

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी। करत सदा शत्रुन क्षयकारी॥

॥ चौपाई ॥

नन्दि गणेश सोहैं तहँ कैसे। सागर मध्य कमल हैं जैसे॥

॥ चौपाई ॥

कार्तिक श्याम और गणराऊ। या छवि को कहि जात न काऊ॥

॥ चौपाई ॥

देवन जबहीं जाय पुकारा। तब ही दुख प्रभु आप निवारा॥

॥ चौपाई ॥

किया उपद्रव तारक भारी। देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी॥

॥ चौपाई ॥

तुरत षडानन आप पठायउ। लवनिमेष महँ मारि गिरायउ॥

॥ चौपाई ॥

आप जलंधर असुर संहारा। सुयश तुम्हार विदित संसारा॥

॥ चौपाई ॥

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई। सबहिं कृपा कर लीन बचाई॥

॥ चौपाई ॥

किया तपहिं भागीरथ भारी। पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी॥

॥ चौपाई ॥

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं। सेवक स्तुति करत सदाहीं॥

॥ चौपाई ॥

वेद नाम महिमा तव गाई। अकथ अनादि भेद नहिं पाई॥

॥ चौपाई ॥

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला। जरत सुरासुर भए विहाला॥

॥ चौपाई ॥

कीन्ही दया तहँ करी सहाई। नीलकण्ठ तब नाम कहाई॥

॥ चौपाई ॥

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा। जीत के लंक विभीषण दीन्हा॥

॥ चौपाई ॥

सहस कमल में हो रहे धारी। कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी॥

॥ चौपाई ॥

एक कमल प्रभु राखेउ जोई। कमल नयन पूजन चहं सोई॥

॥ चौपाई ॥

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर। भए प्रसन्न दिए इच्छित वर॥

॥ चौपाई ॥

जय जय जय अनन्त अविनाशी। करत कृपा सब के घटवासी॥

॥ चौपाई ॥

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै। भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै॥

॥ चौपाई ॥

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो। येहि अवसर मोहि आन उबारो॥

॥ चौपाई ॥

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो। संकट से मोहि आन उबारो॥

॥ चौपाई ॥

मात-पिता भ्राता सब होई। संकट में पूछत नहिं कोई॥

॥ चौपाई ॥

स्वामी एक है आस तुम्हारी। आय हरहु मम संकट भारी॥

॥ चौपाई ॥

धन निर्धन को देत सदा हीं। जो कोई जांचे सो फल पाहीं॥

॥ चौपाई ॥

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी। क्षमहु नाथ अब चूक हमारी॥

॥ चौपाई ॥

शंकर हो संकट के नाशन। मंगल कारण विघ्न विनाशन॥

॥ चौपाई ॥

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं। शारद नारद शीश नवावैं॥

॥ चौपाई ॥

नमो नमो जय नमः शिवाय। सुर ब्रह्मादिक पार न पाय॥

॥ चौपाई ॥

जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत है शम्भु सहाई॥

॥ चौपाई ॥

ऋनियां जो कोई हो अधिकारी। पाठ करे सो पावन हारी॥

॥ चौपाई ॥

पुत्र होन कर इच्छा जोई। निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई॥

॥ चौपाई ॥

पण्डित त्रयोदशी को लावे। ध्यान पूर्वक होम करावे॥

॥ चौपाई ॥

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा। ताके तन नहीं रहै कलेशा॥

॥ चौपाई ॥

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे। शंकर सम्मुख पाठ सुनावे॥

॥ चौपाई ॥

जन्म जन्म के पाप नसावे। अन्त धाम शिवपुर में पावे॥

॥ चौपाई ॥

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी। जानि सकल दुःख हरहु हमारी॥

॥ दोहा ॥

नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा। तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश॥

॥ दोहा ॥

मगसर छठि हेमन्त ऋतु, संवत चौसठ जान। अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिव चालीसा कब पढ़नी चाहिए?

इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में सोमवार, प्रदोष (त्रयोदशी), सावन का महीना और महाशिवरात्रि विशेष शुभ माने जाते हैं। सुबह स्नान के बाद शिवलिंग या शिव जी के चित्र के सामने पाठ करना अच्छा माना जाता है।

शिव चालीसा किसने लिखी?

चालीसा की अंतिम चौपाई और पहले दोहे में अयोध्यादास जी का नाम आता है, इसलिए इन्हें इसका रचयिता माना जाता है।

शिव चालीसा पढ़ने से क्या लाभ होता है?

भक्तों का विश्वास है कि श्रद्धा से पाठ करने पर मन शांत होता है, डर कम होता है और शिव जी की कृपा मिलती है। चालीसा स्वयं त्रयोदशी व्रत और नियमित पाठ की महिमा बताती है। सबसे ज़रूरी है सच्चा मन और नियम।

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