तुलसी जी की आरती — अर्थ सहित
तुलसी माता भगवान विष्णु की प्रिय हैं। कार्तिक मास में, तुलसी विवाह पर और नित्य संध्या पूजा में उनकी आरती गाई जाती है।
जय तुलसी माता, मैया जय तुलसी माता। जो जन तुमको पूजते, उनको सुख दाता॥
भगवान विष्णु को प्यारी, हरि को हो तुम प्यारी। तुलसी दल से उनके, चरण कमल संवारी॥
कार्तिक मास में तुम्हारी, महिमा है अपारी। तुलसी विवाह रचाकर, मंगल करो हमारी॥
शालिग्राम के संग में, नित्य विराजो तुम। दीनन की सुन लो विनती, शरण में राखो हम॥
अर्थ
पद 1
जय तुलसी माता, मैया जय तुलसी माता। जो जन तुमको पूजते, उनको सुख दाता॥
हे तुलसी माता, आपकी जय हो। जो लोग आपकी पूजा करते हैं, आप उन्हें सुख और कल्याण देती हैं।
पद 2
भगवान विष्णु को प्यारी, हरि को हो तुम प्यारी। तुलसी दल से उनके, चरण कमल संवारी॥
आप भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय हैं। तुलसी के पत्तों से उनके चरण-कमलों की सेवा होती है।
पद 3
कार्तिक मास में तुम्हारी, महिमा है अपारी। तुलसी विवाह रचाकर, मंगल करो हमारी॥
कार्तिक मास में आपकी महिमा अपार है। तुलसी विवाह के पावन अवसर पर हमारा कल्याण करें।
पद 4
शालिग्राम के संग में, नित्य विराजो तुम। दीनन की सुन लो विनती, शरण में राखो हम॥
शालिग्राम के साथ सदा विराजमान रहें। दीन-हीन लोगों की प्रार्थना सुनकर हमें अपनी शरण में रखें।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
तुलसी जी की आरती कब करें?
नित्य संध्या के समय, कार्तिक मास में, तुलसी विवाह पर और भगवान विष्णु की पूजा के बाद तुलसी आरती करना शुभ माना जाता है।
तुलसी की पूजा क्यों की जाती है?
परंपरागत मान्यता है कि तुलसी भगवान विष्णु की सर्वप्रिय हैं। उनकी पूजा से घर में सुख-शांति और पवित्रता बनी रहती है।
तुलसी विवाह कब होता है?
तुलसी विवाह कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) को होता है। इस दिन तुलसी जी का विवाह शालिग्राम (भगवान विष्णु के प्रतीक) से करवाया जाता है।