ॐ जय जगदीश हरे आरती — अर्थ सहित

भगवान विष्णु की यह आरती लगभग हर घर और मंदिर में गाई जाती है। गुरुवार और हर पूजा के अंत में इसे गाना शुभ माना जाता है।

8 पद · लगभग 5 मिनट

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥

जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का। सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥

मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी। तुम बिन और न दूजा, आस करूँ मैं जिसकी॥

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी। पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता। मैं मूरख फलकामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति। किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥

दीनबन्धु दुखहर्ता, ठाकुर तुम मेरे। अपने हाथ उठाओ, अपनी शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे॥

विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'ॐ जय जगदीश हरे' किसने लिखी?

यह आरती 19वीं सदी में पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी ने लिखी थी।

यह आरती कब गाई जाती है?

लगभग हर पूजा के अंत में, और विशेष रूप से गुरुवार, एकादशी और सत्यनारायण कथा के बाद।

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