ॐ जय जगदीश हरे आरती — अर्थ सहित
भगवान विष्णु की यह आरती लगभग हर घर और मंदिर में गाई जाती है। गुरुवार और हर पूजा के अंत में इसे गाना शुभ माना जाता है।
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का। सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी। तुम बिन और न दूजा, आस करूँ मैं जिसकी॥
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी। पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता। मैं मूरख फलकामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति। किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥
दीनबन्धु दुखहर्ता, ठाकुर तुम मेरे। अपने हाथ उठाओ, अपनी शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे॥
विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥
अर्थ
पद 1
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
हे जगत के स्वामी हरि, आपकी जय हो। आप भक्तों और सेवकों के संकट पल भर में दूर करते हैं।
पद 2
जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का। सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
जो आपका ध्यान करता है उसे फल मिलता है, मन का दुख मिटता है, घर में सुख-संपत्ति आती है और शरीर का कष्ट दूर होता है।
पद 3
मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी। तुम बिन और न दूजा, आस करूँ मैं जिसकी॥
आप ही मेरे माता-पिता हैं, मैं और किसकी शरण लूँ? आपके सिवा कोई दूसरा नहीं जिससे मैं आशा रखूँ।
पद 4
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी। पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥
आप पूर्ण परमात्मा हैं, सबके मन की जानने वाले हैं; आप परब्रह्म परमेश्वर और सबके स्वामी हैं।
पद 5
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता। मैं मूरख फलकामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥
आप करुणा के सागर और पालनहार हैं। मैं मूर्ख हूँ और फल की इच्छा रखता हूँ; मैं सेवक हूँ, आप स्वामी — हे पालनहार, कृपा करें।
पद 6
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति। किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥
आप एक हैं, इंद्रियों से परे हैं, सबके प्राणों के स्वामी हैं। हे दयामय, मैं कम बुद्धि वाला आपसे किस तरह मिलूँ?
पद 7
दीनबन्धु दुखहर्ता, ठाकुर तुम मेरे। अपने हाथ उठाओ, अपनी शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे॥
आप दीनों के बंधु, दुख हरने वाले और मेरे ठाकुर हैं। अपना हाथ बढ़ाइए, मुझे अपनी शरण में लीजिए — मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ।
पद 8
विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा। श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥
हे देव, मेरे विषय-विकार मिटाइए, पाप हरिए; मेरी श्रद्धा, भक्ति और संतों की सेवा बढ़ाइए।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
'ॐ जय जगदीश हरे' किसने लिखी?
यह आरती 19वीं सदी में पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी ने लिखी थी।
यह आरती कब गाई जाती है?
लगभग हर पूजा के अंत में, और विशेष रूप से गुरुवार, एकादशी और सत्यनारायण कथा के बाद।