अन्नपूर्णा चालीसा — अर्थ सहित
अन्नपूर्णा चालीसा काशी की अधीश्वरी, अन्न देने वाली माँ अन्नपूर्णा की स्तुति है, जो माँ पार्वती का ही रूप हैं। इसमें सती के देह-त्याग, पार्वती के जन्म, उनकी कठोर तपस्या और शिव को पति रूप में पाने की कथा है। अन्नपूर्णा जयंती और शुक्रवार को इसका पाठ होता है।
॥ दोहा ॥
विश्वेश्वर पदपदम की, रज निज शीश लगाय। अन्नपूर्णे! तव सुयश, बरनौं कवि मतिलाय॥
॥ चौपाई ॥
नित्य आनन्द करिणी माता। वर अरु अभय भाव प्रख्याता॥
॥ चौपाई ॥
जय! सौंदर्य सिन्धु जग जननी। अखिल पाप हर भव-भय हरनी॥
॥ चौपाई ॥
श्वेत बदन पर श्वेत बसन पुनि। सन्तन तुव पद सेवत ऋषिमुनि॥
॥ चौपाई ॥
काशी पुराधीश्वरी माता। माहेश्वरी सकल जग त्राता॥
॥ चौपाई ॥
वृषभारूढ़ नाम रुद्राणी। विश्व विहारिणि जय! कल्याणी॥
॥ चौपाई ॥
पतिदेवता सुतीत शिरोमणि। पदवी प्राप्त कीन्ह गिरि नंदिनि॥
॥ चौपाई ॥
पति विछोह दुख सहि नहिं पावा। योग अग्नि तब बदन जरावा॥
॥ चौपाई ॥
देह तजत शिव चरण सनेहू। राखेहु जात हिमगिरि गेहू॥
॥ चौपाई ॥
प्रकटी गिरिजा नाम धरायो। अति आनन्द भवन महँ छायो॥
॥ चौपाई ॥
नारद ने तब तोहिं भरमायहु। ब्याह करन हित पाठ पढ़ायहु॥
॥ चौपाई ॥
ब्रह्मा वरुण कुबेर गनाये। देवराज आदिक कहि गाये॥
॥ चौपाई ॥
सब देवन को सुजस बखानी। मति पलटन की मन महँ ठानी॥
॥ चौपाई ॥
अचल रहीं तुम प्रण पर धन्या। कीन्ही सिद्ध हिमाचल कन्या॥
॥ चौपाई ॥
निज कौ तब नारद घबराये। तब प्रण पूरण मंत्र पढ़ाये॥
॥ चौपाई ॥
करन हेतु तप तोहिं उपदेशेउ। सन्त बचन तुम सत्य परेखेहु॥
॥ चौपाई ॥
गगनगिरा सुनि टरी न टारे। ब्रह्मा तब तुव पास पधारे॥
॥ चौपाई ॥
कहेउ पुत्रि वर माँगु अनूपा। देहुँ आज तुव मति अनुरूपा॥
॥ चौपाई ॥
तुम तप कीन्ह अलौकिक भारी। कष्ट उठायहु अति सुकुमारी॥
॥ चौपाई ॥
अब संदेह छाँड़ि कछु मोसों। है सौगंध नहीं छल तोसों॥
॥ चौपाई ॥
करत वेद विद ब्रह्मा जानहु। वचन मोर यह साँचा मानहु॥
॥ चौपाई ॥
तजि संकोच कहहु निज इच्छा। देहौं मैं मनमानी भिक्षा॥
॥ चौपाई ॥
सुनि ब्रह्मा की मधुरी बानी। मुख सों कछु मुसुकाय भवानी॥
॥ चौपाई ॥
बोलीं तुम का कहहु विधाता। तुम तो जग के स्रष्टाधाता॥
॥ चौपाई ॥
मम कामना गुप्त नहिं तोंसों। कहवावा चाहहु का मोंसों॥
॥ चौपाई ॥
दक्ष यज्ञ महँ मरती बारा। शंभुनाथ पुनि होहिं हमारा॥
॥ चौपाई ॥
सो अब मिलहिं मोहिं मनभाये। कहि तथास्तु विधि धाम सिधाये॥
॥ चौपाई ॥
तब गिरिजा शंकर तव भयऊ। फल कामना संशयो गयऊ॥
॥ चौपाई ॥
चन्द्रकोटि रवि कोटि प्रकाशा। तव आनन महँ करत निवासा॥
॥ चौपाई ॥
माला पुस्तक अंकुश सोहै। कर महँ अपर पाश मन मोहै॥
॥ चौपाई ॥
अन्नपूर्णे! सदापूर्णे। अज अनवद्य अनन्त पूर्णे॥
॥ चौपाई ॥
कृपा सागरी क्षेमंकरि माँ। भव विभूति आनन्द भरी माँ॥
॥ चौपाई ॥
कमल विलोचन विलसित भाले। देवि कालिके चण्डि कराले॥
॥ चौपाई ॥
तुम कैलास माँहि ह्वै गिरिजा। विलसी आनन्द साथ सिन्धुजा॥
॥ चौपाई ॥
स्वर्ग महालक्ष्मी कहलायी। मर्त्य लोक लक्ष्मी पद पायी॥
॥ चौपाई ॥
विलसी सब महँ सर्व सरूपा। सेवत तोहिं अमर पुर भूपा॥
॥ चौपाई ॥
जो पढ़िहहिं यह तव चालीसा। फल पइहहिं शुभ साखी ईसा॥
॥ चौपाई ॥
प्रात समय जो जन मन लायो। पढ़िहहिं भक्ति सुरुचि अधिकायो॥
॥ चौपाई ॥
स्त्री कलत्र पति मित्र पुत्र युत। परमैश्वर्य लाभ लहि अद्भुत॥
॥ चौपाई ॥
राज विमुख को राज दिवावै। जस तेरो जन सुजस बढ़ावै॥
॥ चौपाई ॥
पाठ महा मुद मंगल दाता। भक्त मनोवांछित निधि पाता॥
॥ दोहा ॥
जो यह चालीसा सुभग, पढ़ि नावहिंगे माथ। तिनके कारज सिद्ध सब, साखी काशी नाथ॥
अर्थ
दोहा
विश्वेश्वर पदपदम की, रज निज शीश लगाय। अन्नपूर्णे! तव सुयश, बरनौं कवि मतिलाय॥
विश्वनाथ शिव के चरण-कमलों की धूल अपने सिर पर लगाकर, हे अन्नपूर्णा, मैं अपनी बुद्धि के अनुसार आपके यश का वर्णन करता हूँ।
चौपाई 1
नित्य आनन्द करिणी माता। वर अरु अभय भाव प्रख्याता॥
माँ सदा आनंद देने वाली हैं। वर और अभय देने वाले रूप के लिए आप प्रसिद्ध हैं।
चौपाई 2
जय! सौंदर्य सिन्धु जग जननी। अखिल पाप हर भव-भय हरनी॥
सुंदरता के सागर, जगत-जननी की जय हो। आप सब पाप और संसार का भय हरती हैं।
चौपाई 3
श्वेत बदन पर श्वेत बसन पुनि। सन्तन तुव पद सेवत ऋषिमुनि॥
आपके उजले शरीर पर उजले वस्त्र हैं। संत, ऋषि और मुनि आपके चरणों की सेवा करते हैं।
चौपाई 4
काशी पुराधीश्वरी माता। माहेश्वरी सकल जग त्राता॥
आप काशी नगरी की अधीश्वरी माता हैं। हे माहेश्वरी, आप पूरे जगत की रक्षक हैं।
चौपाई 5
वृषभारूढ़ नाम रुद्राणी। विश्व विहारिणि जय! कल्याणी॥
आप बैल पर सवार रुद्राणी हैं। सारे विश्व में विचरने वाली कल्याणी, आपकी जय हो।
चौपाई 6
पतिदेवता सुतीत शिरोमणि। पदवी प्राप्त कीन्ह गिरि नंदिनि॥
हे गिरिराज की पुत्री, आपने पतिव्रता स्त्रियों में सबसे ऊँचा स्थान पाया।
चौपाई 7
पति विछोह दुख सहि नहिं पावा। योग अग्नि तब बदन जरावा॥
(सती रूप में) पति के अपमान और बिछोह का दुःख आप सह न सकीं, तब योग-अग्नि में अपना शरीर जला दिया।
चौपाई 8
देह तजत शिव चरण सनेहू। राखेहु जात हिमगिरि गेहू॥
देह त्यागते समय भी शिव के चरणों में आपका प्रेम बना रहा, और आप हिमालय के घर जा पहुँचीं।
चौपाई 9
प्रकटी गिरिजा नाम धरायो। अति आनन्द भवन महँ छायो॥
आप प्रकट हुईं और आपका नाम गिरिजा रखा गया। पूरे घर में बड़ा आनंद छा गया।
चौपाई 10
नारद ने तब तोहिं भरमायहु। ब्याह करन हित पाठ पढ़ायहु॥
तब नारद ने आपकी परीक्षा लेने के लिए आपको भ्रमित करना चाहा और विवाह के बारे में सीख दी।
चौपाई 11
ब्रह्मा वरुण कुबेर गनाये। देवराज आदिक कहि गाये॥
उन्होंने ब्रह्मा, वरुण, कुबेर, इंद्र आदि देवताओं के नाम गिनाए और उनकी प्रशंसा की।
चौपाई 12
सब देवन को सुजस बखानी। मति पलटन की मन महँ ठानी॥
सब देवताओं का यश बखानकर उन्होंने आपका मन बदलने की ठानी।
चौपाई 13
अचल रहीं तुम प्रण पर धन्या। कीन्ही सिद्ध हिमाचल कन्या॥
पर हे धन्य हिमाचल-पुत्री, आप अपने संकल्प पर अटल रहीं और उसे सिद्ध करके दिखाया।
चौपाई 14
निज कौ तब नारद घबराये। तब प्रण पूरण मंत्र पढ़ाये॥
तब नारद स्वयं चकित हो गए और उन्होंने आपको संकल्प पूरा करने वाला मंत्र सिखाया।
चौपाई 15
करन हेतु तप तोहिं उपदेशेउ। सन्त बचन तुम सत्य परेखेहु॥
उन्होंने आपको तप करने का उपदेश दिया, और आपने संत के वचनों को सच्चा मानकर अपनाया।
चौपाई 16
गगनगिरा सुनि टरी न टारे। ब्रह्मा तब तुव पास पधारे॥
आकाशवाणी सुनकर भी आप अपने संकल्प से नहीं डिगीं। तब ब्रह्मा जी आपके पास आए।
चौपाई 17
कहेउ पुत्रि वर माँगु अनूपा। देहुँ आज तुव मति अनुरूपा॥
उन्होंने कहा — बेटी, कोई अनुपम वर माँगो; आज मैं तुम्हारी इच्छा के अनुसार वर दूँगा।
चौपाई 18
तुम तप कीन्ह अलौकिक भारी। कष्ट उठायहु अति सुकुमारी॥
तुमने बहुत भारी और अलौकिक तप किया है। इतनी कोमल होकर भी बहुत कष्ट सहे हैं।
चौपाई 19
अब संदेह छाँड़ि कछु मोसों। है सौगंध नहीं छल तोसों॥
अब मुझसे कोई संदेह मत रखो; मैं सौगंध खाकर कहता हूँ, तुमसे कोई छल नहीं है।
चौपाई 20
करत वेद विद ब्रह्मा जानहु। वचन मोर यह साँचा मानहु॥
मुझे वेदों को जानने वाला ब्रह्मा समझो, और मेरे वचन को सच्चा मानो।
चौपाई 21
तजि संकोच कहहु निज इच्छा। देहौं मैं मनमानी भिक्षा॥
संकोच छोड़कर अपनी इच्छा बताओ; मैं तुम्हें मनचाहा वरदान दूँगा।
चौपाई 22
सुनि ब्रह्मा की मधुरी बानी। मुख सों कछु मुसुकाय भवानी॥
ब्रह्मा जी की मीठी बातें सुनकर भवानी थोड़ा मुस्कुराईं।
चौपाई 23
बोलीं तुम का कहहु विधाता। तुम तो जग के स्रष्टाधाता॥
वे बोलीं — हे विधाता, आप क्या पूछते हैं? आप तो संसार के रचयिता और पालक हैं।
चौपाई 24
मम कामना गुप्त नहिं तोंसों। कहवावा चाहहु का मोंसों॥
मेरी इच्छा आपसे छिपी नहीं है; फिर भी आप मुझसे क्या कहलवाना चाहते हैं?
चौपाई 25
दक्ष यज्ञ महँ मरती बारा। शंभुनाथ पुनि होहिं हमारा॥
दक्ष के यज्ञ में देह त्यागते समय मेरी यही इच्छा थी कि शिव फिर से मेरे पति बनें।
चौपाई 26
सो अब मिलहिं मोहिं मनभाये। कहि तथास्तु विधि धाम सिधाये॥
वही मनभावन शिव अब मुझे मिलें। ब्रह्मा जी "तथास्तु" कहकर अपने धाम लौट गए।
चौपाई 27
तब गिरिजा शंकर तव भयऊ। फल कामना संशयो गयऊ॥
हे गिरिजा, तब शंकर आपके हो गए; आपकी कामना पूरी हुई और सब संशय मिट गया।
चौपाई 28
चन्द्रकोटि रवि कोटि प्रकाशा। तव आनन महँ करत निवासा॥
करोड़ों चंद्रमाओं और सूर्यों का प्रकाश आपके मुख में बसता है।
चौपाई 29
माला पुस्तक अंकुश सोहै। कर महँ अपर पाश मन मोहै॥
आपके हाथों में माला, पुस्तक और अंकुश शोभा देते हैं, और दूसरे हाथ में पाश मन मोह लेता है।
चौपाई 30
अन्नपूर्णे! सदापूर्णे। अज अनवद्य अनन्त पूर्णे॥
हे अन्नपूर्णा, आप सदा पूर्ण हैं। आप अजन्मा, निर्दोष, अनंत और पूर्ण हैं।
चौपाई 31
कृपा सागरी क्षेमंकरि माँ। भव विभूति आनन्द भरी माँ॥
आप कृपा का सागर और कल्याण करने वाली माँ हैं। आप संसार के वैभव और आनंद से भरी हैं।
चौपाई 32
कमल विलोचन विलसित भाले। देवि कालिके चण्डि कराले॥
आपकी आँखें कमल जैसी हैं और माथा चमकता है। आप ही देवी कालिका, चंडी और कराली हैं।
चौपाई 33
तुम कैलास माँहि ह्वै गिरिजा। विलसी आनन्द साथ सिन्धुजा॥
कैलाश में आप गिरिजा हैं, और (वैकुंठ में) सिंधुजा लक्ष्मी बनकर आनंद से विराजती हैं।
चौपाई 34
स्वर्ग महालक्ष्मी कहलायी। मर्त्य लोक लक्ष्मी पद पायी॥
स्वर्ग में आप महालक्ष्मी कहलाती हैं और धरती पर लक्ष्मी के रूप में पूजी जाती हैं।
चौपाई 35
विलसी सब महँ सर्व सरूपा। सेवत तोहिं अमर पुर भूपा॥
आप सब रूपों में सबके भीतर विराजती हैं। देवलोक के राजा इंद्र भी आपकी सेवा करते हैं।
चौपाई 36
जो पढ़िहहिं यह तव चालीसा। फल पइहहिं शुभ साखी ईसा॥
जो आपकी यह चालीसा पढ़ेंगे, उन्हें शुभ फल मिलेगा — भगवान शिव इसके साक्षी हैं।
चौपाई 37
प्रात समय जो जन मन लायो। पढ़िहहिं भक्ति सुरुचि अधिकायो॥
जो लोग सुबह के समय मन लगाकर, भक्ति और प्रेम के साथ इसे पढ़ेंगे...
चौपाई 38
स्त्री कलत्र पति मित्र पुत्र युत। परमैश्वर्य लाभ लहि अद्भुत॥
...वे परिवार, जीवनसाथी, मित्रों और संतान के साथ अद्भुत सुख-समृद्धि पाते हैं, ऐसा चालीसा कहती है।
चौपाई 39
राज विमुख को राज दिवावै। जस तेरो जन सुजस बढ़ावै॥
आप राज खो चुके को फिर से राज दिलाती हैं। आपका यश भक्त के सुयश को बढ़ाता है।
चौपाई 40
पाठ महा मुद मंगल दाता। भक्त मनोवांछित निधि पाता॥
यह पाठ महान आनंद और मंगल देने वाला है; भक्त इससे मनचाहा धन पाता है।
दोहा
जो यह चालीसा सुभग, पढ़ि नावहिंगे माथ। तिनके कारज सिद्ध सब, साखी काशी नाथ॥
जो इस सुंदर चालीसा को पढ़कर माँ को सिर झुकाएँगे, उनके सब काम सिद्ध होंगे — काशी के नाथ शिव इसके साक्षी हैं।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
अन्नपूर्णा चालीसा कब पढ़नी चाहिए?
इसे रोज़ सुबह पढ़ सकते हैं, कई लोग रसोई में भोजन बनाने से पहले भी पढ़ते हैं। परंपरा से अन्नपूर्णा जयंती (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) और शुक्रवार विशेष शुभ माने जाते हैं।
माँ अन्नपूर्णा कौन हैं?
माँ अन्नपूर्णा माँ पार्वती का वह रूप हैं जो संसार को अन्न देती हैं। काशी में उनका प्रसिद्ध मंदिर है, और भक्त मानते हैं कि वे भगवान शिव को भी भिक्षा देती हैं।
इस चालीसा में कौन सी कथा है?
इसमें सती के योग-अग्नि में देह त्यागने, हिमालय के घर गिरिजा के रूप में जन्म, नारद की परीक्षा, कठोर तपस्या और ब्रह्मा जी से शिव को पाने के वर की कथा है।