भैरव चालीसा — अर्थ सहित
भैरव चालीसा भगवान कालभैरव की स्तुति है, जो शिव के उग्र और रक्षक रूप हैं। वे काशी के कोतवाल और मृत्यु के देवता माने जाते हैं, फिर भी भक्तों पर वे सदा कृपालु हैं। भैरव अष्टमी, शनिवार और रात्रि-काल में इस चालीसा का पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।
॥ दोहा ॥
श्री गणेश गुरुपाद नमूँ, नमूँ शारद माय। कालभैरव की महिमा, गाऊँ प्रेम लगाय॥
॥ दोहा ॥
जय कालभैरव दुःखहर्ता, जय काशी-कोतवाल। भव-बंधन से मुक्त करो, नमूँ तुम्हें तत्काल॥
॥ चौपाई ॥
जय कालभैरव शम्भु-स्वरूपा। नीलवर्ण तन रौद्र-अनूपा॥ चार भुजाएँ त्रिशूल-धारी। खप्पर-डमरू शत्रु-संहारी॥
॥ चौपाई ॥
नरमुंड माला गले सुहावे। सर्प-भुजंग तन को सजावे॥ श्वान-वाहन पर करो विहारा। रात्रि-काल के हो तुम रखवारा॥
॥ चौपाई ॥
भृकुटी चढ़ी नयन लाल भारी। जटाजूट पर चंद्र सुखकारी॥ भस्म-लिप्त तन दिव्य निराला। भूत-प्रेत दल संग तुम्हारा॥
॥ चौपाई ॥
काशी-पुरी के हो कोतवाला। जो आवे-जाये तुम्हीं सँभाला॥ देहांत-काल तारक-मंत्र देते। यही मोक्ष का मार्ग-अनंते॥
॥ चौपाई ॥
काशी में जो तन को त्यागे। शिव-ध्यान से उसके पाप भागे॥ कान में तारक-ध्वनि सुनाते। उसको मोक्ष-धाम पहुँचाते॥
॥ चौपाई ॥
ब्रह्मा के शिर पंचम काटा। ब्रह्म-हत्या का दोष लगा घाटा॥ भिक्षा-पात्र बन कपाल थामा। भटकत-भटकत काशी धामा॥
॥ चौपाई ॥
काशी की पावन भूमि पग रखा। कपाल भूमि पर गिरत वहाँ। ब्रह्म-हत्या से मुक्त हुए तब। काशी के तुम रक्षक बने तब॥
॥ चौपाई ॥
अष्ट-भैरव के तुम हो नायक। आठों दिश के रक्षक-सायक॥ असितांग रुरु चंड-कराला। क्रोध उन्मत्त कपाली ज्वाला॥
॥ चौपाई ॥
भीषण और संहार-भैरवा। आठों मिल करें जग-सेवा॥ आठों दिशा के हैं रक्षक ये। सकल जगत के पालक ये॥
॥ चौपाई ॥
रात्रि में तुम नगर भ्रमण करते। भूत-पिशाच को दंड देते॥ जो रात्रि-काल में तुम्हें सुमिरे। कोई बाधा उसको न घेरे॥
॥ चौपाई ॥
श्वान-रूप में तुम विचरते। भक्तों के द्वारे रक्षा करते॥ जो श्वान को भोजन कराए। वही भैरव-प्रसाद पाए॥
॥ चौपाई ॥
काले तिल और उड़द अर्पण। सरसों तेल से करे दीपन॥ नींबू-मिठाई भी चढ़ाएँ। भैरव-कृपा को वह पाएँ॥
॥ चौपाई ॥
शनिवार और कालाष्टमी-दिन। भैरव-पूजन का है शुभ निदिन॥ मार्गशीर्ष कृष्ण-अष्टमी। यही तिथि है शुभ भैरव-महिमी॥
॥ चौपाई ॥
तंत्र-मंत्र के तुम अधिपति। शत्रु-नाश और बाधा-हर्ती॥ संकट-मोचन भव-दुःख-हर्ता। भक्तों के सदा कारज-कर्ता॥
॥ चौपाई ॥
भय से त्रस्त जो साधक आए। भैरव-शरण में वह मुक्त पाए॥ बड़ी-से-बड़ी विपदा भी हर्ते। भैरव-कृपा से शुभ करते॥
॥ चौपाई ॥
संकट में जो तुम्हें पुकारे। भैरव तत्काल दुःख निवारे॥ रात को भी न होए डरना। जो भैरव को हृदय में धरना॥
॥ चौपाई ॥
रोग-शोक और दुर्भाग्य टले। भैरव-स्मरण से चित्त निर्मल मिले॥ उच्च-नीच का भेद न माने। भैरव सबकी पीड़ा पहचाने॥
॥ चौपाई ॥
प्रेत-बाधा और तंत्र-बाधा। भैरव-पूजन से हो निवाधा॥ जो बुरी नज़र से पीड़ित होए। भैरव-कृपा से वह मुक्त होए॥
॥ चौपाई ॥
यात्रा में जो तुम्हें सुमिरे। कोई बाधा उसको न घेरे॥ सफर में भैरव रक्षक बनते। खतरों से वह सदा बचते॥
॥ चौपाई ॥
शत्रु-नाश की जो कामना। भैरव-पूजन से पूर्ण करना॥ न्याय-देवता भी तुम्हीं हो। अन्याय-कर्म का दंड दो॥
॥ चौपाई ॥
शनि की पीड़ा हरते भैरव। राहु-केतु भय हरते भैरव॥ नवग्रह-पीड़ा से जो व्याकुल। भैरव-शरण में पाए वह विमल॥
॥ चौपाई ॥
संतान-हीन को संतान मिले। कर्ज़-ग्रस्त का कर्ज़ भी टले॥ जो माँगे श्रद्धा से आकर। भैरव पूरन करें मनोरथ-साकर॥
॥ चौपाई ॥
वीरता और बल के हो दाता। भक्तों के सब मनोरथ-पाता॥ शस्त्र-पूजन में तुम्हें मनाएँ। रण में वीर सुरक्षा पाएँ॥
॥ चौपाई ॥
गृह-प्रवेश और नई शुरुआत। भैरव-पूजन से शुभ हो बात॥ नई राह पर जो कदम रखे। भैरव-कृपा से शुभ-पथ लखे॥
॥ चौपाई ॥
क्रोध-ताप और द्वेष-भाव। भैरव-स्मरण से करे अभाव॥ मन में शांति और समता आए। जो भैरव-ध्यान नित्य लगाए॥
॥ चौपाई ॥
वज्र-देह और अटल मनोबल। भैरव-कृपा से मिलता है बल॥ रोग-शोक और दुर्भाग्य टले। भैरव-चरणों में जो मन लगाले॥
॥ चौपाई ॥
झूठ-कपट को कभी न सहते। सत्य-पथ पर भक्त को रखते॥ धर्म-मार्ग का पालन करने पर। भैरव देते फल मन-भरने पर॥
॥ चौपाई ॥
उज्जैन के कालभैरव-स्वामी। क्षेत्रपाल हो तुम अंतर्यामी॥ काशी-विश्वनाथ के द्वारपाल। शिव-लीला के हो तुम रखवाल॥
॥ चौपाई ॥
ब्रह्मा-विष्णु-शिव तुम्हें नमाते। देव और मुनि गुण-गान गाते॥ कोई न जाने तुम्हारी सीमा। अपरम्पार है तुम्हारी महिमा॥
॥ चौपाई ॥
कालाष्टमी पर जो पूजन करे। कालभैरव की कृपा को वरे॥ अभिषेक से करे संतुष्ट। भैरव प्रसन्न हों भक्त-जन-शिष्ट॥
॥ चौपाई ॥
प्रतिदिन करे जो स्तुति-पाठ। भैरव-कृपा से मिटे अभाव-आठ॥ वर्ष-भर के संकट दूर होते। जीवन में शुभ-मंगल होते॥
॥ चौपाई ॥
नित्य सुबह-शाम दीप जलाएँ। भैरव-चालीसा का पाठ करें॥ श्रद्धा-भाव से जो नमन करे। उसका संकट भैरव सदा हरे॥
॥ चौपाई ॥
श्वान को भोजन रोज कराएँ। गरीब-असहाय को भोजन खिलाएँ॥ यही भैरव-पूजन का सार है। यही भक्ति का उत्तम द्वार है॥
॥ चौपाई ॥
इक्कीस बार जो पाठ करे। भैरव-कृपा का वरण करे॥ संकट में पाठ नित करने से। शांति मिले, डर जाए हटने से॥
॥ चौपाई ॥
शिव के अंश हो तुम महाकाल। पर भक्तों के हो कृपाल॥ काल से डरे न जो तुम्हें भजे। भैरव-कृपा से मुक्त-पद सजे॥
॥ चौपाई ॥
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत है भैरव सहाई॥ ऋनियाँ जो कोई पाठ करे। भैरव की कृपा को वह वरे॥
॥ चौपाई ॥
जय भैरव जय कालभैरव। जय काशी-पति जय महाभैरव॥ जय अष्टभैरव जय त्रिभुवन-पति। जय शिव-अंश जय जगत-विधाता-मति॥
॥ दोहा ॥
भैरव-चालीसा यह पाठ, नित पढ़े जो लाय ध्यान। भैरव-कृपा से उस जन को, मिले मोक्ष-कल्याण॥
अर्थ
दोहा
श्री गणेश गुरुपाद नमूँ, नमूँ शारद माय। कालभैरव की महिमा, गाऊँ प्रेम लगाय॥
श्री गणेश और गुरु के चरणों में तथा माँ शारदा को प्रणाम करके, मैं कालभैरव की महिमा को प्रेम के साथ गाता हूँ।
दोहा
जय कालभैरव दुःखहर्ता, जय काशी-कोतवाल। भव-बंधन से मुक्त करो, नमूँ तुम्हें तत्काल॥
हे दुःखहर्ता कालभैरव और काशी के कोतवाल, आपकी जय हो। आप मुझे संसार के बंधन से मुक्त कीजिए; मैं अभी आपको प्रणाम करता हूँ।
चौपाई 1
जय कालभैरव शम्भु-स्वरूपा। नीलवर्ण तन रौद्र-अनूपा॥ चार भुजाएँ त्रिशूल-धारी। खप्पर-डमरू शत्रु-संहारी॥
हे कालभैरव, आप शंभु (शिव) के स्वरूप हैं। आपका नीले रंग का शरीर अद्वितीय रौद्र रूप में है। चार भुजाओं में त्रिशूल, खप्पर और डमरू धारण किए, आप शत्रुओं का संहार करते हैं।
चौपाई 2
नरमुंड माला गले सुहावे। सर्प-भुजंग तन को सजावे॥ श्वान-वाहन पर करो विहारा। रात्रि-काल के हो तुम रखवारा॥
आपके गले में नरमुंड की माला सुशोभित है और सर्प शरीर को सजाते हैं। आप श्वान पर सवार होकर विचरण करते हैं और रात के रखवाले हैं।
चौपाई 3
भृकुटी चढ़ी नयन लाल भारी। जटाजूट पर चंद्र सुखकारी॥ भस्म-लिप्त तन दिव्य निराला। भूत-प्रेत दल संग तुम्हारा॥
आपकी भृकुटी चढ़ी हुई है और नेत्र बड़े लाल हैं। जटाजूट पर चंद्रमा शोभायमान है। भस्म-लिप्त शरीर अनोखी दिव्यता लिए हुए है और भूत-प्रेत का दल सदा आपके साथ है।
चौपाई 4
काशी-पुरी के हो कोतवाला। जो आवे-जाये तुम्हीं सँभाला॥ देहांत-काल तारक-मंत्र देते। यही मोक्ष का मार्ग-अनंते॥
आप काशी नगरी के कोतवाल हैं। जो भी आता-जाता है, उसकी देखभाल आप ही करते हैं। मृत्यु के समय आप तारक-मंत्र देते हैं, यही मोक्ष का अनंत मार्ग है।
चौपाई 5
काशी में जो तन को त्यागे। शिव-ध्यान से उसके पाप भागे॥ कान में तारक-ध्वनि सुनाते। उसको मोक्ष-धाम पहुँचाते॥
जो काशी में देह त्यागता है, शिव के ध्यान से उसके पाप नष्ट हो जाते हैं। आप उसके कान में तारक-मंत्र सुनाते हैं और उसे मोक्ष-धाम पहुँचा देते हैं।
चौपाई 6
ब्रह्मा के शिर पंचम काटा। ब्रह्म-हत्या का दोष लगा घाटा॥ भिक्षा-पात्र बन कपाल थामा। भटकत-भटकत काशी धामा॥
जब ब्रह्मा ने अहंकारवश बोला, आपने उनका पाँचवाँ सिर काट दिया, परंतु ब्रह्म-हत्या का दोष लग गया। कपाल को भिक्षा-पात्र बनाकर आप भटकते-भटकते काशी धाम पधारे।
चौपाई 7
काशी की पावन भूमि पग रखा। कपाल भूमि पर गिरत वहाँ। ब्रह्म-हत्या से मुक्त हुए तब। काशी के तुम रक्षक बने तब॥
काशी की पवित्र भूमि पर पाँव रखते ही वह कपाल वहीं गिर गया। तभी आप ब्रह्म-हत्या के पाप से मुक्त हुए और काशी के रक्षक बन गए।
चौपाई 8
अष्ट-भैरव के तुम हो नायक। आठों दिश के रक्षक-सायक॥ असितांग रुरु चंड-कराला। क्रोध उन्मत्त कपाली ज्वाला॥
आप अष्टभैरवों के नेता हैं और आठों दिशाओं के रक्षक हैं। असितांग, रुरु, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली — ये आपके उग्र स्वरूप हैं।
चौपाई 9
भीषण और संहार-भैरवा। आठों मिल करें जग-सेवा॥ आठों दिशा के हैं रक्षक ये। सकल जगत के पालक ये॥
भीषण और संहार-भैरव मिलाकर ये सभी आठ मिलकर जगत की सेवा करते हैं। ये आठों दिशाओं के रक्षक और समग्र सृष्टि के पालक हैं।
चौपाई 10
रात्रि में तुम नगर भ्रमण करते। भूत-पिशाच को दंड देते॥ जो रात्रि-काल में तुम्हें सुमिरे। कोई बाधा उसको न घेरे॥
आप रात को नगर में भ्रमण करते हैं और भूत-पिशाचों को दंड देते हैं। जो रात के समय आपका स्मरण करता है, उसे कोई बाधा नहीं घेरती।
चौपाई 11
श्वान-रूप में तुम विचरते। भक्तों के द्वारे रक्षा करते॥ जो श्वान को भोजन कराए। वही भैरव-प्रसाद पाए॥
आप श्वान (कुत्ते) के रूप में विचरण करते हैं और भक्तों के दरवाजे पर रक्षा करते हैं। जो कुत्ते को भोजन कराता है, उसे भैरव का प्रसाद प्राप्त होता है — ऐसी मान्यता है।
चौपाई 12
काले तिल और उड़द अर्पण। सरसों तेल से करे दीपन॥ नींबू-मिठाई भी चढ़ाएँ। भैरव-कृपा को वह पाएँ॥
काले तिल और उड़द अर्पित करें और सरसों के तेल से दीप जलाएँ। नींबू और मिठाई भी चढ़ाएँ — ऐसा करने से भैरव की कृपा मिलती है।
चौपाई 13
शनिवार और कालाष्टमी-दिन। भैरव-पूजन का है शुभ निदिन॥ मार्गशीर्ष कृष्ण-अष्टमी। यही तिथि है शुभ भैरव-महिमी॥
शनिवार और कालाष्टमी भैरव पूजन के लिए विशेष शुभ दिन हैं। मार्गशीर्ष महीने की कृष्ण-अष्टमी भैरव अष्टमी की पावन तिथि है।
चौपाई 14
तंत्र-मंत्र के तुम अधिपति। शत्रु-नाश और बाधा-हर्ती॥ संकट-मोचन भव-दुःख-हर्ता। भक्तों के सदा कारज-कर्ता॥
आप तंत्र और मंत्र के अधिपति हैं, शत्रु-नाशक और बाधा-हर्ता हैं। आप संकट-मोचन और संसार के दुखों से मुक्त करने वाले हैं और भक्तों के काम सदा पूरे करते हैं।
चौपाई 15
भय से त्रस्त जो साधक आए। भैरव-शरण में वह मुक्त पाए॥ बड़ी-से-बड़ी विपदा भी हर्ते। भैरव-कृपा से शुभ करते॥
जो भय से पीड़ित साधक आपकी शरण में आता है, उसे मुक्ति का अनुभव होता है। बड़ी-से-बड़ी विपत्ति भी आप हर लेते हैं और भैरव-कृपा से सब शुभ होता है।
चौपाई 16
संकट में जो तुम्हें पुकारे। भैरव तत्काल दुःख निवारे॥ रात को भी न होए डरना। जो भैरव को हृदय में धरना॥
जो संकट में आपको पुकारता है, भैरव तुरंत उसका दुःख दूर करते हैं। जो भैरव को हृदय में धारण करता है, उसे रात में भी डर नहीं लगता।
चौपाई 17
रोग-शोक और दुर्भाग्य टले। भैरव-स्मरण से चित्त निर्मल मिले॥ उच्च-नीच का भेद न माने। भैरव सबकी पीड़ा पहचाने॥
भैरव-स्मरण से रोग, शोक और दुर्भाग्य दूर होते हैं और मन निर्मल होता है। भैरव ऊँच-नीच का भेद नहीं करते और सभी की पीड़ा समझते हैं।
चौपाई 18
प्रेत-बाधा और तंत्र-बाधा। भैरव-पूजन से हो निवाधा॥ जो बुरी नज़र से पीड़ित होए। भैरव-कृपा से वह मुक्त होए॥
प्रेत-बाधा और तंत्र-बाधा भैरव पूजन से दूर होती है। जो बुरी नज़र से पीड़ित हो, वह भैरव-कृपा से मुक्त होता है।
चौपाई 19
यात्रा में जो तुम्हें सुमिरे। कोई बाधा उसको न घेरे॥ सफर में भैरव रक्षक बनते। खतरों से वह सदा बचते॥
यात्रा में जो आपका स्मरण करता है, उसे कोई बाधा नहीं घेरती। सफर में भैरव रक्षक बनकर उसे खतरों से बचाते हैं।
चौपाई 20
शत्रु-नाश की जो कामना। भैरव-पूजन से पूर्ण करना॥ न्याय-देवता भी तुम्हीं हो। अन्याय-कर्म का दंड दो॥
शत्रु-नाश की कामना हो तो भैरव पूजन से वह पूर्ण होती है। आप न्याय के देवता भी हैं और अन्याय-कर्म को दंडित करते हैं।
चौपाई 21
शनि की पीड़ा हरते भैरव। राहु-केतु भय हरते भैरव॥ नवग्रह-पीड़ा से जो व्याकुल। भैरव-शरण में पाए वह विमल॥
शनि और राहु-केतु की पीड़ा भैरव दूर करते हैं। जो नवग्रह की पीड़ा से व्याकुल हो, वह भैरव-शरण में आकर निर्मल हो जाता है।
चौपाई 22
संतान-हीन को संतान मिले। कर्ज़-ग्रस्त का कर्ज़ भी टले॥ जो माँगे श्रद्धा से आकर। भैरव पूरन करें मनोरथ-साकर॥
संतानहीन को संतान की प्राप्ति होती है और कर्ज़ से पीड़ित का कर्ज़ टलता है। जो श्रद्धा से आकर माँगता है, उसकी मनोकामनाएँ भैरव पूर्ण करते हैं — ऐसी भक्तों की मान्यता है।
चौपाई 23
वीरता और बल के हो दाता। भक्तों के सब मनोरथ-पाता॥ शस्त्र-पूजन में तुम्हें मनाएँ। रण में वीर सुरक्षा पाएँ॥
आप वीरता और बल के दाता हैं और भक्तों की सभी कामनाएँ पूर्ण करते हैं। शस्त्र-पूजन में आपको मनाने पर रणभूमि में वीर सुरक्षित रहते हैं।
चौपाई 24
गृह-प्रवेश और नई शुरुआत। भैरव-पूजन से शुभ हो बात॥ नई राह पर जो कदम रखे। भैरव-कृपा से शुभ-पथ लखे॥
गृह-प्रवेश और नई शुरुआत के समय भैरव पूजन से सब शुभ होता है। नई राह पर कदम रखने वाला भैरव-कृपा से सही मार्ग देखता है।
चौपाई 25
क्रोध-ताप और द्वेष-भाव। भैरव-स्मरण से करे अभाव॥ मन में शांति और समता आए। जो भैरव-ध्यान नित्य लगाए॥
भैरव-स्मरण से क्रोध, ताप और द्वेष का अभाव होता है। जो नित्य भैरव का ध्यान करता है, उसके मन में शांति और समता आती है।
चौपाई 26
वज्र-देह और अटल मनोबल। भैरव-कृपा से मिलता है बल॥ रोग-शोक और दुर्भाग्य टले। भैरव-चरणों में जो मन लगाले॥
भैरव-कृपा से शरीर वज्र-जैसा मजबूत और मनोबल अटल होता है। जो भैरव के चरणों में मन लगाता है, उसके रोग, शोक और दुर्भाग्य टल जाते हैं।
चौपाई 27
झूठ-कपट को कभी न सहते। सत्य-पथ पर भक्त को रखते॥ धर्म-मार्ग का पालन करने पर। भैरव देते फल मन-भरने पर॥
आप झूठ और कपट को कभी नहीं सहते और भक्त को सत्य-मार्ग पर रखते हैं। धर्म-मार्ग का पालन करने पर भैरव मन-भावन फल देते हैं।
चौपाई 28
उज्जैन के कालभैरव-स्वामी। क्षेत्रपाल हो तुम अंतर्यामी॥ काशी-विश्वनाथ के द्वारपाल। शिव-लीला के हो तुम रखवाल॥
आप उज्जैन के कालभैरव-स्वामी हैं और क्षेत्र के अंतर्यामी संरक्षक हैं। आप काशी-विश्वनाथ के द्वारपाल और शिव की लीला के रखवाले हैं।
चौपाई 29
ब्रह्मा-विष्णु-शिव तुम्हें नमाते। देव और मुनि गुण-गान गाते॥ कोई न जाने तुम्हारी सीमा। अपरम्पार है तुम्हारी महिमा॥
ब्रह्मा, विष्णु और शिव आपको नमन करते हैं; देव और मुनि आपकी महिमा गाते हैं। आपकी सीमा कोई नहीं जानता; आपकी महिमा असीम है।
चौपाई 30
कालाष्टमी पर जो पूजन करे। कालभैरव की कृपा को वरे॥ अभिषेक से करे संतुष्ट। भैरव प्रसन्न हों भक्त-जन-शिष्ट॥
कालाष्टमी पर जो पूजन करता है, वह कालभैरव की कृपा का पात्र बनता है। अभिषेक से भैरव को संतुष्ट करने पर वे प्रसन्न होकर भक्त को आशीर्वाद देते हैं।
चौपाई 31
प्रतिदिन करे जो स्तुति-पाठ। भैरव-कृपा से मिटे अभाव-आठ॥ वर्ष-भर के संकट दूर होते। जीवन में शुभ-मंगल होते॥
जो प्रतिदिन इस स्तुति का पाठ करता है, भैरव-कृपा से उसकी सभी कमियाँ दूर होती हैं। वर्ष-भर के संकट नष्ट होते हैं और जीवन में शुभ और मंगल आता है।
चौपाई 32
नित्य सुबह-शाम दीप जलाएँ। भैरव-चालीसा का पाठ करें॥ श्रद्धा-भाव से जो नमन करे। उसका संकट भैरव सदा हरे॥
नित्य सुबह और शाम दीप जलाएँ और भैरव-चालीसा का पाठ करें। जो श्रद्धाभाव से नमन करता है, भैरव उसके संकट सदा दूर करते हैं।
चौपाई 33
श्वान को भोजन रोज कराएँ। गरीब-असहाय को भोजन खिलाएँ॥ यही भैरव-पूजन का सार है। यही भक्ति का उत्तम द्वार है॥
रोज़ कुत्ते को और गरीब-असहाय लोगों को भोजन खिलाएँ। यही भैरव पूजन का सार है और यही भक्ति का सर्वोत्तम द्वार है।
चौपाई 34
इक्कीस बार जो पाठ करे। भैरव-कृपा का वरण करे॥ संकट में पाठ नित करने से। शांति मिले, डर जाए हटने से॥
जो इक्कीस बार इसका पाठ करे, वह भैरव-कृपा का पात्र बनता है। संकट में नित्य पाठ करने से शांति मिलती है और डर दूर होता है।
चौपाई 35
शिव के अंश हो तुम महाकाल। पर भक्तों के हो कृपाल॥ काल से डरे न जो तुम्हें भजे। भैरव-कृपा से मुक्त-पद सजे॥
आप शिव के अंश महाकाल हैं, फिर भी भक्तों पर सदा कृपालु हैं। जो आपको भजता है, उसे काल से डर नहीं लगता और भैरव-कृपा से उसे मुक्ति का पद मिलता है।
चौपाई 36
जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत है भैरव सहाई॥ ऋनियाँ जो कोई पाठ करे। भैरव की कृपा को वह वरे॥
जो मन लगाकर इसका पाठ करता है, भैरव उसके सहायक बनते हैं — ऐसा भक्तों का विश्वास है। जो कर्ज़ से पीड़ित हो, वह भी पाठ करे, भैरव की कृपा उसे मिलती है।
चौपाई 37
जय भैरव जय कालभैरव। जय काशी-पति जय महाभैरव॥ जय अष्टभैरव जय त्रिभुवन-पति। जय शिव-अंश जय जगत-विधाता-मति॥
जय भैरव, जय कालभैरव, जय काशी के स्वामी, जय महाभैरव। जय अष्टभैरव, जय त्रिभुवन के स्वामी, जय शिव-अंश और जगत के विधाता।
दोहा
भैरव-चालीसा यह पाठ, नित पढ़े जो लाय ध्यान। भैरव-कृपा से उस जन को, मिले मोक्ष-कल्याण॥
जो नित्य ध्यान से इस भैरव-चालीसा का पाठ करता है, उसे भैरव-कृपा से मोक्ष और कल्याण प्राप्त होता है — ऐसी भक्तों की श्रद्धा है।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
भैरव चालीसा कब पढ़नी चाहिए?
इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में शनिवार, कालाष्टमी और भैरव अष्टमी (मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी) विशेष शुभ माने जाते हैं। रात्रि में पाठ करना भी शुभ माना जाता है। अनेक भक्त मध्यरात्रि में या सूर्यास्त के बाद भैरव का पूजन करते हैं।
भैरव पूजन में क्या अर्पित करें?
परंपरागत रूप से काले तिल, उड़द की दाल, सरसों के तेल का दीप, नींबू और गुड़ अर्पित किया जाता है। कुत्ते को भोजन कराना भैरव को प्रसन्न करने का सरल उपाय माना जाता है। गरीब और जरूरतमंद को भोजन कराना भी भैरव-पूजन का हिस्सा माना जाता है।
भैरव का वाहन कुत्ता क्यों है?
परंपरा में कुत्ते को रात का जागरूक और वफादार रक्षक माना जाता है। भैरव रात के रखवाले हैं और कुत्ता उनके साथी और वाहन के रूप में उनकी नगर-रक्षा में सहायक है। कुत्तों को भोजन कराना इसीलिए भैरव की सेवा का रूप माना जाता है।
भैरव चालीसा पढ़ने से क्या लाभ होता है?
भक्तों का विश्वास है कि श्रद्धा से पाठ करने पर भय, शत्रु-भय और रात्रि-भय कम होता है, मन को शांति मिलती है और भैरव की सुरक्षा प्राप्त होती है। परंपरा में इसे काशी की यात्रा, शनि-पीड़ा और नवग्रह-बाधा में भी पढ़ा जाता है। सबसे ज़रूरी है सच्चा मन और नियमित पाठ।