दुर्गा चालीसा — अर्थ सहित

दुर्गा चालीसा माँ दुर्गा की प्रसिद्ध स्तुति है, जो 'नमो नमो दुर्गे सुख करनी' से शुरू होती है। अंतिम चौपाई में देवीदास का नाम आता है। इसमें माँ के अनेक रूपों — लक्ष्मी, सरस्वती, काली, महाविद्याओं — और असुरों पर उनकी विजय का वर्णन है। नवरात्रि, मंगलवार और शुक्रवार को इसका पाठ विशेष रूप से किया जाता है।

41 चौपाई · लगभग 8 मिनट

॥ चौपाई ॥

नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो अम्बे दुःख हरनी॥

॥ चौपाई ॥

निराकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूँ लोक फैली उजियारी॥

॥ चौपाई ॥

शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥

॥ चौपाई ॥

रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे॥

॥ चौपाई ॥

तुम संसार शक्ति लै कीना। पालन हेतु अन्न धन दीना॥

॥ चौपाई ॥

अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥

॥ चौपाई ॥

प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥

॥ चौपाई ॥

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥

॥ चौपाई ॥

रूप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥

॥ चौपाई ॥

धरयो रूप नरसिंह को अम्बा। परगट भई फाड़कर खम्बा॥

॥ चौपाई ॥

रक्षा करि प्रह्लाद बचायो। हिरण्याकुश को स्वर्ग पठायो॥

॥ चौपाई ॥

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥

॥ चौपाई ॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा। दयासिन्धु दीजै मन आसा॥

॥ चौपाई ॥

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥

॥ चौपाई ॥

मातंगी अरु धूमावति माता। भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥

॥ चौपाई ॥

श्री भैरव तारा जग तारिणी। छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥

॥ चौपाई ॥

केहरि वाहन सोह भवानी। लांगुर वीर चलत अगवानी॥

॥ चौपाई ॥

कर में खप्पर खड्ग विराजै। जाको देख काल डर भाजै॥

॥ चौपाई ॥

सोहै अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला॥

॥ चौपाई ॥

नगरकोट में तुम्हीं विराजत। तिहुँलोक में डंका बाजत॥

॥ चौपाई ॥

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे। रक्तबीज शंखन संहारे॥

॥ चौपाई ॥

महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥

॥ चौपाई ॥

रूप कराल कालिका धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥

॥ चौपाई ॥

परी गाढ़ सन्तन पर जब जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥

॥ चौपाई ॥

अमरपुरी अरु बासव लोका। तब महिमा सब रहें अशोका॥

॥ चौपाई ॥

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥

॥ चौपाई ॥

प्रेम भक्ति से जो यश गावें। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥

॥ चौपाई ॥

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥

॥ चौपाई ॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी। योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥

॥ चौपाई ॥

शंकर आचारज तप कीनो। काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥

॥ चौपाई ॥

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥

॥ चौपाई ॥

शक्ति रूप का मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो॥

॥ चौपाई ॥

शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदम्ब भवानी॥

॥ चौपाई ॥

भई प्रसन्न आदि जगदम्बा। दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥

॥ चौपाई ॥

मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥

॥ चौपाई ॥

आशा तृष्णा निपट सतावें। मोह मदादिक सब बिनशावें॥

॥ चौपाई ॥

शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥

॥ चौपाई ॥

करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला॥

॥ चौपाई ॥

जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ। तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ॥

॥ चौपाई ॥

श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥

॥ चौपाई ॥

देवीदास शरण निज जानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दुर्गा चालीसा कब पढ़नी चाहिए?

इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। चैत्र और शारदीय नवरात्रि के नौ दिन, अष्टमी, और मंगलवार व शुक्रवार परंपरा से विशेष शुभ माने जाते हैं। सुबह या शाम दीप जलाकर माँ के सामने पाठ करें।

नवरात्रि में दुर्गा चालीसा कितनी बार पढ़ें?

कोई सख़्त नियम नहीं है। बहुत से भक्त नौ दिनों तक रोज़ एक बार पाठ करते हैं, कुछ लोग 3, 7 या 11 बार भी पढ़ते हैं। गिनती से ज़्यादा ज़रूरी श्रद्धा और नियमितता है।

दुर्गा चालीसा पढ़ने से क्या लाभ माना जाता है?

भक्तों का विश्वास है कि श्रद्धा से पाठ करने पर डर दूर होता है, मन को साहस मिलता है और माँ की कृपा बनी रहती है। चालीसा स्वयं कहती है कि प्रेम से यश गाने वालों के पास दुख नहीं आता।

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