लक्ष्मी चालीसा — अर्थ सहित
श्री लक्ष्मी चालीसा माँ लक्ष्मी की स्तुति है, जो 'सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही' से शुरू होती है। इसके दोहों और अंतिम चौपाई में रामदास का नाम आता है। इसमें समुद्र मंथन से माँ के प्रकट होने और हर अवतार में विष्णु की सेवा करने का वर्णन है। शुक्रवार, दिवाली और शरद पूर्णिमा पर इसका पाठ विशेष माना जाता है।
॥ दोहा ॥
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास। मनोकामना सिद्ध करि, पुरवहु मेरी आस॥
॥ दोहा ॥
यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करूं। सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥
॥ चौपाई ॥
सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोही॥
॥ चौपाई ॥
तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरवहु आस हमारी॥
॥ चौपाई ॥
जय जय जगत जननि जगदम्बा। सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥
॥ चौपाई ॥
तुम ही हो सब घट घट वासी। विनती यही हमारी खासी॥
॥ चौपाई ॥
जगजननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥
॥ चौपाई ॥
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी॥
॥ चौपाई ॥
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥
॥ चौपाई ॥
कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी। जगजननी विनती सुन मोरी॥
॥ चौपाई ॥
ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥
॥ चौपाई ॥
क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिन्धु में पायो॥
॥ चौपाई ॥
चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभु बनि दासी॥
॥ चौपाई ॥
जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रूप बदल तहं सेवा कीन्हा॥
॥ चौपाई ॥
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥
॥ चौपाई ॥
तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥
॥ चौपाई ॥
अपनाया तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥
॥ चौपाई ॥
तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी। कहं लौ महिमा कहौं बखानी॥
॥ चौपाई ॥
मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन इच्छित वांछित फल पाई॥
॥ चौपाई ॥
तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मन लाई॥
॥ चौपाई ॥
और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करै मन लाई॥
॥ चौपाई ॥
ताको कोई कष्ट न होई। मन इच्छित पावै फल सोई॥
॥ चौपाई ॥
त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणी॥
॥ चौपाई ॥
जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै। ध्यान लगाकर सुनै सुनावै॥
॥ चौपाई ॥
ताकौ कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥
॥ चौपाई ॥
पुत्रहीन अरु संपति हीना। अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना॥
॥ चौपाई ॥
विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥
॥ चौपाई ॥
पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥
॥ चौपाई ॥
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥
॥ चौपाई ॥
बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥
॥ चौपाई ॥
प्रतिदिन पाठ करै मन माही। उन सम कोइ जग में कहुं नाहीं॥
॥ चौपाई ॥
बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥
॥ चौपाई ॥
करि विश्वास करै व्रत नेमा। होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥
॥ चौपाई ॥
जय जय जय लक्ष्मी भवानी। सब में व्यापित हो गुण खानी॥
॥ चौपाई ॥
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं॥
॥ चौपाई ॥
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥
॥ चौपाई ॥
भूल चूक करि क्षमा हमारी। दर्शन दीजै दशा निहारी॥
॥ चौपाई ॥
बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी। तुमहि अछत दुःख सहते भारी॥
॥ चौपाई ॥
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥
॥ चौपाई ॥
रूप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥
॥ चौपाई ॥
केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्धि मोहि नहिं अधिकाई॥
॥ चौपाई ॥
रामदास अब कहै पुकारी। करो दूर तुम विपति हमारी॥
॥ दोहा ॥
त्राहि त्राहि दुख हारिणी, हरो वेगि सब त्रास। जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश॥
॥ दोहा ॥
रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर। मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर॥
अर्थ
दोहा
मातु लक्ष्मी करि कृपा, करो हृदय में वास। मनोकामना सिद्ध करि, पुरवहु मेरी आस॥
हे माँ लक्ष्मी, कृपा करके मेरे हृदय में निवास कीजिए; मेरी मनोकामना पूरी करके मेरी आशा पूरी कीजिए।
दोहा
यही मोर अरदास, हाथ जोड़ विनती करूं। सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका॥
यही मेरी प्रार्थना है, मैं हाथ जोड़कर विनती करता हूँ: हर तरह से मेरे जीवन में बसिए। हे जगत की माता, आपकी जय हो।
चौपाई 1
सिन्धु सुता मैं सुमिरौं तोही। ज्ञान बुद्धि विद्या दो मोही॥
हे सागर की पुत्री, मैं आपको याद करता हूँ; मुझे ज्ञान, बुद्धि और विद्या दीजिए।
चौपाई 2
तुम समान नहिं कोई उपकारी। सब विधि पुरवहु आस हमारी॥
आपके समान भला करने वाला कोई नहीं है; हर तरह से हमारी आशा पूरी कीजिए।
चौपाई 3
जय जय जगत जननि जगदम्बा। सबकी तुम ही हो अवलम्बा॥
हे जगत की जननी जगदम्बा, आपकी जय हो; आप ही सबका सहारा हैं।
चौपाई 4
तुम ही हो सब घट घट वासी। विनती यही हमारी खासी॥
आप ही हर प्राणी के भीतर बसती हैं; यही हमारी खास विनती है।
चौपाई 5
जगजननी जय सिन्धु कुमारी। दीनन की तुम हो हितकारी॥
हे जगजननी, सागर की पुत्री, आपकी जय हो; आप दीन-दुखियों का भला करती हैं।
चौपाई 6
विनवौं नित्य तुमहिं महारानी। कृपा करौ जग जननि भवानी॥
हे महारानी, मैं रोज़ आपसे विनती करता हूँ; हे जगजननी भवानी, कृपा कीजिए।
चौपाई 7
केहि विधि स्तुति करौं तिहारी। सुधि लीजै अपराध बिसारी॥
मैं आपकी स्तुति किस तरह करूँ, नहीं जानता; मेरी गलतियाँ भुलाकर मेरी सुध लीजिए।
चौपाई 8
कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी। जगजननी विनती सुन मोरी॥
मेरी ओर कृपा की दृष्टि से देखिए; हे जगजननी, मेरी विनती सुनिए।
चौपाई 9
ज्ञान बुद्धि जय सुख की दाता। संकट हरो हमारी माता॥
ज्ञान, बुद्धि, विजय और सुख देने वाली माँ, हमारे संकट दूर कीजिए।
चौपाई 10
क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो। चौदह रत्न सिन्धु में पायो॥
जब विष्णु की प्रेरणा से क्षीर सागर का मंथन हुआ, तो उसमें से चौदह रत्न निकले।
चौपाई 11
चौदह रत्न में तुम सुखरासी। सेवा कियो प्रभु बनि दासी॥
उन चौदह रत्नों में आप सुख का भंडार थीं; आपने प्रभु की सेविका बनकर उनकी सेवा की।
चौपाई 12
जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा। रूप बदल तहं सेवा कीन्हा॥
प्रभु ने जब-जब जहाँ भी जन्म लिया, आपने रूप बदलकर वहाँ उनकी सेवा की।
चौपाई 13
स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा। लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा॥
जब स्वयं विष्णु ने मनुष्य का शरीर धारण किया और अयोध्या में श्रीराम के रूप में अवतार लिया,
चौपाई 14
तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं। सेवा कियो हृदय पुलकाहीं॥
तब आप जनकपुर में सीता के रूप में प्रकट हुईं और प्रसन्न हृदय से उनकी सेवा की।
चौपाई 15
अपनाया तोहि अन्तर्यामी। विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी॥
सबके मन की जानने वाले प्रभु ने आपको अपनाया; आप तीनों लोकों की स्वामिनी के रूप में प्रसिद्ध हैं।
चौपाई 16
तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी। कहं लौ महिमा कहौं बखानी॥
आपके जैसी प्रबल शक्ति और कोई नहीं है; आपकी महिमा का कहाँ तक वर्णन करूँ?
चौपाई 17
मन क्रम वचन करै सेवकाई। मन इच्छित वांछित फल पाई॥
जो मन, कर्म और वचन से आपकी सेवा करता है, वह मनचाहा फल पाता है — ऐसा यह चालीसा कहती है।
चौपाई 18
तजि छल कपट और चतुराई। पूजहिं विविध भांति मन लाई॥
छल, कपट और चालाकी छोड़कर, मन लगाकर कई तरह से आपकी पूजा करें।
चौपाई 19
और हाल मैं कहौं बुझाई। जो यह पाठ करै मन लाई॥
एक और बात समझाकर कहता हूँ: जो मन लगाकर यह पाठ करता है,
चौपाई 20
ताको कोई कष्ट न होई। मन इच्छित पावै फल सोई॥
उसे कोई कष्ट नहीं होता और वह मनचाहा फल पाता है — ऐसी भक्तों की मान्यता है।
चौपाई 21
त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि। त्रिविध ताप भव बंधन हारिणी॥
हे दुख दूर करने वाली माँ, मेरी रक्षा कीजिए; आप तीनों प्रकार के कष्ट और संसार के बंधन मिटाती हैं।
चौपाई 22
जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै। ध्यान लगाकर सुनै सुनावै॥
जो यह चालीसा पढ़ता है, दूसरों से पढ़वाता है, और ध्यान लगाकर सुनता-सुनाता है,
चौपाई 23
ताकौ कोई न रोग सतावै। पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै॥
उसे कोई रोग नहीं सताता और वह संतान, धन और संपत्ति पाता है — ऐसा चालीसा में कहा गया है।
चौपाई 24
पुत्रहीन अरु संपति हीना। अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना॥
जिसकी संतान न हो, जिसके पास धन न हो, या जो अंधा, बहरा, रोगी या बहुत दुखी हो,
चौपाई 25
विप्र बोलाय कै पाठ करावै। शंका दिल में कभी न लावै॥
वह ब्राह्मण को बुलाकर पाठ करवाए और मन में कभी संदेह न लाए।
चौपाई 26
पाठ करावै दिन चालीसा। ता पर कृपा करैं गौरीसा॥
जो चालीस दिन तक पाठ करवाए, उस पर गौरीपति शिव भी कृपा करते हैं — ऐसा यह चालीसा कहती है।
चौपाई 27
सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै। कमी नहीं काहू की आवै॥
वह बहुत सुख और संपत्ति पाता है और उसे किसी चीज़ की कमी नहीं होती — ऐसी मान्यता है।
चौपाई 28
बारह मास करै जो पूजा। तेहि सम धन्य और नहिं दूजा॥
जो बारहों महीने आपकी पूजा करता है, उसके समान धन्य कोई दूसरा नहीं है।
चौपाई 29
प्रतिदिन पाठ करै मन माही। उन सम कोइ जग में कहुं नाहीं॥
जो रोज़ मन से पाठ करता है, उसके समान संसार में कोई नहीं है।
चौपाई 30
बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई। लेय परीक्षा ध्यान लगाई॥
मैं इसकी और कितनी बड़ाई करूँ; कोई चाहे तो ध्यान लगाकर स्वयं अनुभव कर ले।
चौपाई 31
करि विश्वास करै व्रत नेमा। होय सिद्ध उपजै उर प्रेमा॥
जो विश्वास के साथ व्रत और नियम का पालन करता है, उसका काम सफल होता है और हृदय में प्रेम उपजता है।
चौपाई 32
जय जय जय लक्ष्मी भवानी। सब में व्यापित हो गुण खानी॥
हे लक्ष्मी भवानी, आपकी जय हो; आप सबमें व्याप्त हैं और गुणों की खान हैं।
चौपाई 33
तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं। तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं॥
संसार में आपका तेज बहुत प्रबल है; आपके समान दयालु कहीं कोई नहीं।
चौपाई 34
मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै। संकट काटि भक्ति मोहि दीजै॥
मुझ अनाथ की अब सुध लीजिए; मेरे संकट काटकर मुझे भक्ति दीजिए।
चौपाई 35
भूल चूक करि क्षमा हमारी। दर्शन दीजै दशा निहारी॥
हमारी भूल-चूक क्षमा कीजिए और हमारी हालत देखकर दर्शन दीजिए।
चौपाई 36
बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी। तुमहि अछत दुःख सहते भारी॥
आपके दर्शन के बिना भक्त व्याकुल है; आपके रहते हुए भी हम भारी दुख सह रहे हैं।
चौपाई 37
नहिं मोहिं ज्ञान बुद्धि है तन में। सब जानत हो अपने मन में॥
मुझमें न ज्ञान है न बुद्धि; आप अपने मन में सब कुछ जानती हैं।
चौपाई 38
रूप चतुर्भुज करके धारण। कष्ट मोर अब करहु निवारण॥
अपना चार भुजाओं वाला रूप धारण करके अब मेरे कष्ट दूर कीजिए।
चौपाई 39
केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई। ज्ञान बुद्धि मोहि नहिं अधिकाई॥
मैं किस तरह आपकी बड़ाई करूँ? मेरे पास ज़्यादा ज्ञान और बुद्धि नहीं है।
चौपाई 40
रामदास अब कहै पुकारी। करो दूर तुम विपति हमारी॥
रामदास अब पुकारकर कहते हैं: हे माँ, हमारी विपत्ति दूर कीजिए।
दोहा
त्राहि त्राहि दुख हारिणी, हरो वेगि सब त्रास। जयति जयति जय लक्ष्मी, करो शत्रु को नाश॥
हे दुख हरने वाली माँ, रक्षा कीजिए और जल्दी सब डर दूर कीजिए। हे लक्ष्मी, आपकी जय हो; शत्रुओं का नाश कीजिए।
दोहा
रामदास धरि ध्यान नित, विनय करत कर जोर। मातु लक्ष्मी दास पर, करहु दया की कोर॥
रामदास रोज़ ध्यान करके हाथ जोड़कर विनती करते हैं: हे माँ लक्ष्मी, इस सेवक पर थोड़ी दया कीजिए।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
लक्ष्मी चालीसा किस दिन पढ़नी चाहिए?
शुक्रवार माँ लक्ष्मी का दिन माना जाता है, इसलिए बहुत से भक्त शुक्रवार को पाठ करते हैं। दिवाली, धनतेरस और शरद पूर्णिमा पर भी इसका पाठ विशेष शुभ माना जाता है। वैसे इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है।
लक्ष्मी चालीसा का पाठ कैसे करें?
घर और पूजा स्थान साफ़ रखें, स्नान के बाद माँ के सामने घी का दीप जलाएँ, फूल और मिठाई चढ़ाएँ और शांत मन से पाठ करें। अंत में 'ॐ जय लक्ष्मी माता' आरती गाना आम परंपरा है।
क्या लक्ष्मी चालीसा पढ़ने से धन मिलता है?
चालीसा में सुख-संपत्ति की बात कही गई है, और भक्त मानते हैं कि श्रद्धा से पाठ करने पर माँ की कृपा मिलती है। पर परंपरा यह भी सिखाती है कि लक्ष्मी ईमानदार मेहनत, सफ़ाई और अच्छे आचरण वाले घर में बसती हैं — पाठ इन्हीं के साथ किया जाए।