शीतला माता चालीसा — अर्थ सहित
शीतला चालीसा माँ शीतला की स्तुति है, जिन्हें बच्चों की रक्षा करने वाली और शीतलता देने वाली देवी माना जाता है। हाथ में झाड़ू और कलश लिए, गधे पर सवार माँ की कथा इसमें है। चालीसा के अनुसार इसके कवि रामसुन्दर हैं। शीतला अष्टमी, शीतला सप्तमी और बसोड़ा पर इसका पाठ होता है।
॥ दोहा ॥
जय-जय माता शीतला, तुमहिं धरै जो ध्यान। होय विमल शीतल हृदय, विकसै बुद्धि बल ज्ञान॥
॥ चौपाई ॥
जय-जय-जय शीतला भवानी। जय जग जननि सकल गुणखानी॥
॥ चौपाई ॥
गृह-गृह शक्ति तुम्हारी राजित। पूरण शरदचन्द्र सम साजित॥
॥ चौपाई ॥
विस्फोटक से जलत शरीरा। शीतल करत हरत सब पीरा॥
॥ चौपाई ॥
मातु शीतला तव शुभनामा। सबके गाढ़े आवहिं कामा॥
॥ चौपाई ॥
शोकहरी शंकरी भवानी। बाल-प्राणरक्षी सुखदानी॥
॥ चौपाई ॥
शुचि मार्जनी कलश कर राजै। मस्तक तेज सूर्य सम राजै॥
॥ चौपाई ॥
चौंसठ योगिन संग में गावैं। वीणा ताल मृदंग बजावैं॥
॥ चौपाई ॥
नृत्य नाथ भैरौं दिखरावैं। सहज शेष शिव पार न पावैं॥
॥ चौपाई ॥
धन्य-धन्य धात्री महारानी। सुरनर मुनि तव सुयश बखानी॥
॥ चौपाई ॥
ज्वाला रूप महा बलकारी। दैत्य एक विस्फोटक भारी॥
॥ चौपाई ॥
घर-घर प्रविशत कोई न रक्षत। रोग रूप धरि बालक भक्षत॥
॥ चौपाई ॥
हाहाकार मच्यो जग भारी। सक्यो न जब संकट टारी॥
॥ चौपाई ॥
तब मैया धरि अद्भुत रूपा। कर में लिये मार्जनी सूपा॥
॥ चौपाई ॥
विस्फोटकहिं पकड़ि कर लीन्ह्यो। मुसल प्रहार बहुविधि कीन्ह्यो॥
॥ चौपाई ॥
बहुत प्रकार वह विनती कीन्हा। मैया नहीं भल मैं कछु चीन्हा॥
॥ चौपाई ॥
अबनहिं मातु, काहुगृह जइहौं। जहँ अपवित्र सकल दुःख हरिहौं॥
॥ चौपाई ॥
भभकत तन, शीतल ह्वै जइहैं। विस्फोटक भयघोर नसइहैं॥
॥ चौपाई ॥
श्री शीतलहिं भजे कल्याना। वचन सत्य भाषे भगवाना॥
॥ चौपाई ॥
विस्फोटक भय जिहि गृह भाई। भजै देवि कहँ यही उपाई॥
॥ चौपाई ॥
कलश शीतला का सजवावै। द्विज से विधिवत पाठ करावै॥
॥ चौपाई ॥
तुम्हीं शीतला, जग की माता। तुम्हीं पिता जग की सुखदाता॥
॥ चौपाई ॥
तुम्हीं जगद्धात्री सुखसेवी। नमो नमामि शीतले देवी॥
॥ चौपाई ॥
नमो सुक्खकरणी दुःखहरणी। नमो-नमो जगतारणि तरणी॥
॥ चौपाई ॥
नमो-नमो त्रैलोक्य वन्दिनी। दुखदारिद्रादिक निकन्दिनी॥
॥ चौपाई ॥
श्री शीतला, शेढ़ला, महला। रुणलीह्युणनी मातु मंदला॥
॥ चौपाई ॥
हो तुम दिगम्बर तनुधारी। शोभित पंचनाम असवारी॥
॥ चौपाई ॥
रासभ, खर बैशाख सुनन्दन। गर्दभ दुर्वाकंद निकन्दन॥
॥ चौपाई ॥
सुमिरत संग शीतला माई। जाहि सकल दुख दूर पराई॥
॥ चौपाई ॥
गलका, गलगण्डादि जु होई। ताकर मंत्र न औषधि कोई॥
॥ चौपाई ॥
एक मातु जी का आराधन। और नहिं कोई है साधन॥
॥ चौपाई ॥
निश्चय मातु शरण जो आवै। निर्भय मन इच्छित फल पावै॥
॥ चौपाई ॥
कोढ़ी, निर्मल काया धारै। अन्धा, दृग निज दृष्टि निहारै॥
॥ चौपाई ॥
वन्ध्या नारि पुत्र को पावै। जन्म दरिद्र धनी होइ जावै॥
॥ चौपाई ॥
मातु शीतला के गुण गावत। लखा मूक को छन्द बनावत॥
॥ चौपाई ॥
यामे कोई करै जनि शंका। जग में मैया का ही डंका॥
॥ चौपाई ॥
भनत रामसुन्दर प्रभुदासा। तट प्रयाग से पूरब पासा॥
॥ चौपाई ॥
पुरी तिवारी मोर निवासा। ककरा गंगा तट दुर्वासा॥
॥ चौपाई ॥
अब विलम्ब मैं तोहि पुकारत। मातु कृपा कौ बाट निहारत॥
॥ चौपाई ॥
पड़ा द्वार तव आस लगाई। रक्षा करहु शीतला माई॥
॥ दोहा ॥
घट-घट वासी शीतला, शीतल प्रभा तुम्हार। शीतल छइयाँ में झुलई, मइया पलना डार॥
अर्थ
दोहा
जय-जय माता शीतला, तुमहिं धरै जो ध्यान। होय विमल शीतल हृदय, विकसै बुद्धि बल ज्ञान॥
माता शीतला की जय हो। जो आपका ध्यान करता है, उसका हृदय निर्मल और शांत होता है, और बुद्धि, बल व ज्ञान बढ़ते हैं।
चौपाई 1
जय-जय-जय शीतला भवानी। जय जग जननि सकल गुणखानी॥
शीतला भवानी की जय हो। सब गुणों की खान, जगत-जननी की जय हो।
चौपाई 2
गृह-गृह शक्ति तुम्हारी राजित। पूरण शरदचन्द्र सम साजित॥
घर-घर में आपकी शक्ति विराजती है। आप शरद पूर्णिमा के चंद्रमा जैसी शोभित हैं।
चौपाई 3
विस्फोटक से जलत शरीरा। शीतल करत हरत सब पीरा॥
जब शरीर फोड़ों के ताप से जलता है, तब भक्त मानते हैं कि आप उसे शीतल करके पीड़ा हरती हैं।
चौपाई 4
मातु शीतला तव शुभनामा। सबके गाढ़े आवहिं कामा॥
हे माँ शीतला, आपका शुभ नाम सबके कठिन समय में काम आता है।
चौपाई 5
शोकहरी शंकरी भवानी। बाल-प्राणरक्षी सुखदानी॥
आप शोक हरने वाली शंकरी भवानी हैं। आप बच्चों के प्राणों की रक्षा करती हैं और सुख देती हैं।
चौपाई 6
शुचि मार्जनी कलश कर राजै। मस्तक तेज सूर्य सम राजै॥
आपके हाथों में पवित्र झाड़ू और कलश शोभा देते हैं। माथे पर सूर्य जैसा तेज चमकता है।
चौपाई 7
चौंसठ योगिन संग में गावैं। वीणा ताल मृदंग बजावैं॥
चौंसठ योगिनियाँ आपके साथ गाती हैं और वीणा, ताल व मृदंग बजाती हैं।
चौपाई 8
नृत्य नाथ भैरौं दिखरावैं। सहज शेष शिव पार न पावैं॥
भैरवनाथ नृत्य दिखाते हैं। शेषनाग और शिव भी आपकी महिमा का पार नहीं पाते।
चौपाई 9
धन्य-धन्य धात्री महारानी। सुरनर मुनि तव सुयश बखानी॥
धन्य हैं पालन करने वाली महारानी। देवता, मनुष्य और मुनि आपका यश गाते हैं।
चौपाई 10
ज्वाला रूप महा बलकारी। दैत्य एक विस्फोटक भारी॥
एक बहुत बलवान, आग जैसे रूप वाला विस्फोटक नाम का भयानक दैत्य था।
चौपाई 11
घर-घर प्रविशत कोई न रक्षत। रोग रूप धरि बालक भक्षत॥
वह घर-घर में घुस जाता था और कोई रोक नहीं पाता था। रोग का रूप लेकर वह बच्चों को सताता था।
चौपाई 12
हाहाकार मच्यो जग भारी। सक्यो न जब संकट टारी॥
संसार में भारी हाहाकार मच गया, जब कोई इस संकट को टाल न सका।
चौपाई 13
तब मैया धरि अद्भुत रूपा। कर में लिये मार्जनी सूपा॥
तब माँ ने अद्भुत रूप धारण किया और हाथ में झाड़ू और सूप लिया।
चौपाई 14
विस्फोटकहिं पकड़ि कर लीन्ह्यो। मुसल प्रहार बहुविधि कीन्ह्यो॥
उन्होंने विस्फोटक को पकड़ लिया और मूसल से उस पर कई तरह से प्रहार किए।
चौपाई 15
बहुत प्रकार वह विनती कीन्हा। मैया नहीं भल मैं कछु चीन्हा॥
तब उसने बहुत तरह से विनती की — माँ, मैंने भला-बुरा कुछ नहीं पहचाना।
चौपाई 16
अबनहिं मातु, काहुगृह जइहौं। जहँ अपवित्र सकल दुःख हरिहौं॥
हे माँ, अब मैं किसी (पवित्र) घर में नहीं जाऊँगा; जहाँ अपवित्रता हो, वहीं का दुःख बनकर रहूँगा — दैत्य ने ऐसा वचन दिया।
चौपाई 17
भभकत तन, शीतल ह्वै जइहैं। विस्फोटक भयघोर नसइहैं॥
जलते हुए शरीर शीतल हो जाएँगे और विस्फोटक का घोर भय मिट जाएगा।
चौपाई 18
श्री शीतलहिं भजे कल्याना। वचन सत्य भाषे भगवाना॥
श्री शीतला का भजन करने से कल्याण होता है — यह सच्चा वचन स्वयं भगवान ने कहा है।
चौपाई 19
विस्फोटक भय जिहि गृह भाई। भजै देवि कहँ यही उपाई॥
जिस घर में विस्फोटक का भय हो, वहाँ देवी का भजन करना ही उपाय बताया गया है।
चौपाई 20
कलश शीतला का सजवावै। द्विज से विधिवत पाठ करावै॥
शीतला माता का कलश सजाएँ और ब्राह्मण से विधि-विधान से पाठ करवाएँ।
चौपाई 21
तुम्हीं शीतला, जग की माता। तुम्हीं पिता जग की सुखदाता॥
हे शीतला, आप ही जगत की माता और आप ही पिता हैं; आप संसार को सुख देती हैं।
चौपाई 22
तुम्हीं जगद्धात्री सुखसेवी। नमो नमामि शीतले देवी॥
आप ही जगत का पालन करने वाली हैं। हे शीतला देवी, आपको बार-बार नमस्कार।
चौपाई 23
नमो सुक्खकरणी दुःखहरणी। नमो-नमो जगतारणि तरणी॥
सुख देने वाली और दुःख हरने वाली माँ को नमस्कार। जगत को पार लगाने वाली नाव जैसी माँ को नमस्कार।
चौपाई 24
नमो-नमो त्रैलोक्य वन्दिनी। दुखदारिद्रादिक निकन्दिनी॥
तीनों लोकों द्वारा पूजी जाने वाली माँ को नमस्कार। आप दुःख और दरिद्रता आदि को मिटाती हैं।
चौपाई 25
श्री शीतला, शेढ़ला, महला। रुणलीह्युणनी मातु मंदला॥
शीतला, शेढ़ला, महला, रुणलीह्युणनी और मंदला — ये सब माँ के ही नाम हैं।
चौपाई 26
हो तुम दिगम्बर तनुधारी। शोभित पंचनाम असवारी॥
आप दिगम्बर रूप धारण करती हैं, और पाँच नामों वाले वाहन पर सवार होकर शोभा पाती हैं।
चौपाई 27
रासभ, खर बैशाख सुनन्दन। गर्दभ दुर्वाकंद निकन्दन॥
आपके वाहन के नाम हैं — रासभ, खर, बैशाखनंदन, गर्दभ और दूर्वा खाने वाला; यानी गधा।
चौपाई 28
सुमिरत संग शीतला माई। जाहि सकल दुख दूर पराई॥
माँ शीतला का स्मरण करते ही सब दुःख दूर भाग जाते हैं।
चौपाई 29
गलका, गलगण्डादि जु होई। ताकर मंत्र न औषधि कोई॥
कवि कहते हैं कि गले के कष्ट जैसी पीड़ाओं में उनके लिए माँ के सिवा कोई सहारा नहीं — यह कवि की पूर्ण शरणागति का भाव है।
चौपाई 30
एक मातु जी का आराधन। और नहिं कोई है साधन॥
उनके लिए केवल माँ की आराधना ही एकमात्र साधन है।
चौपाई 31
निश्चय मातु शरण जो आवै। निर्भय मन इच्छित फल पावै॥
जो विश्वास के साथ माँ की शरण में आता है, वह निर्भय होकर मनचाहा फल पाता है।
चौपाई 32
कोढ़ी, निर्मल काया धारै। अन्धा, दृग निज दृष्टि निहारै॥
चालीसा कहती है कि माँ की कृपा से कोढ़ी को निर्मल शरीर और अंधे को दृष्टि मिलती है — यह माँ की महिमा का भक्ति-भरा वर्णन है।
चौपाई 33
वन्ध्या नारि पुत्र को पावै। जन्म दरिद्र धनी होइ जावै॥
निःसंतान स्त्री संतान पाती है और जन्म से गरीब भी धनी हो जाता है, ऐसा चालीसा कहती है।
चौपाई 34
मातु शीतला के गुण गावत। लखा मूक को छन्द बनावत॥
माँ शीतला के गुण गाते हुए गूँगे को भी छंद रचते देखा गया है।
चौपाई 35
यामे कोई करै जनि शंका। जग में मैया का ही डंका॥
इसमें कोई शंका न करे; संसार में माँ का ही डंका बजता है।
चौपाई 36
भनत रामसुन्दर प्रभुदासा। तट प्रयाग से पूरब पासा॥
प्रभु के दास रामसुन्दर कहते हैं — मैं प्रयाग के तट से पूर्व दिशा में पास ही रहता हूँ।
चौपाई 37
पुरी तिवारी मोर निवासा। ककरा गंगा तट दुर्वासा॥
मेरा निवास तिवारीपुर में है, जहाँ ककरा में गंगा के किनारे दुर्वासा ऋषि का आश्रम है।
चौपाई 38
अब विलम्ब मैं तोहि पुकारत। मातु कृपा कौ बाट निहारत॥
हे माँ, मैं आपको पुकार रहा हूँ और आपकी कृपा की राह देख रहा हूँ; अब देर न कीजिए।
चौपाई 39
पड़ा द्वार तव आस लगाई। रक्षा करहु शीतला माई॥
मैं आशा लगाए आपके द्वार पर पड़ा हूँ। हे माँ शीतला, मेरी रक्षा कीजिए।
दोहा
घट-घट वासी शीतला, शीतल प्रभा तुम्हार। शीतल छइयाँ में झुलई, मइया पलना डार॥
हे शीतला, आप हर हृदय में बसती हैं और आपकी आभा शीतल है। हे माँ, अपनी ठंडी छाँव में पालना डालकर हमें झुलाइए।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
शीतला चालीसा कब पढ़नी चाहिए?
परंपरा से होली के बाद चैत्र कृष्ण अष्टमी (शीतला अष्टमी या बसोड़ा) और शीतला सप्तमी पर इसका पाठ होता है। कई भक्त हर सोमवार या शुक्रवार को भी पढ़ते हैं।
शीतला अष्टमी पर बासी भोजन क्यों चढ़ाते हैं?
माँ शीतला को ठंडक प्रिय है, इसलिए परंपरा में एक दिन पहले बना भोजन (बसोड़ा) चढ़ाया जाता है और उस दिन चूल्हा नहीं जलाया जाता।
माँ शीतला का वाहन और रूप कैसा है?
माँ शीतला गधे पर सवार रहती हैं और उनके हाथों में झाड़ू, सूप और जल का कलश होता है — ये स्वच्छता और शीतलता के प्रतीक माने जाते हैं। भक्त उनसे रक्षा की प्रार्थना करते हैं, और बीमारी में डॉक्टर की सलाह भी ज़रूरी है।