वैष्णो देवी चालीसा — अर्थ सहित
वैष्णो देवी चालीसा जम्मू के त्रिकुटा पर्वत पर विराजमान माँ वैष्णो देवी की स्तुति है। इसमें माँ की तपस्या, भक्त श्रीधर का भंडारा, भैरों का पीछा, अर्धकुंवारी गुफा और पिंडी रूप की कथा है। अंतिम चौपाई में कवि 'शर्मा' का नाम आता है। नवरात्रि में इसका पाठ विशेष होता है।
॥ दोहा ॥
गरुड़ वाहिनी वैष्णवी, त्रिकुटा पर्वत धाम। काली, लक्ष्मी, सरस्वती, शक्ति तुम्हें प्रणाम॥
॥ चौपाई ॥
नमो नमो वैष्णो वरदानी। कलि काल में शुभ कल्याणी॥
॥ चौपाई ॥
मणि पर्वत पर ज्योति तुम्हारी। पिंडी रूप में हो अवतारी॥
॥ चौपाई ॥
देवी देवता अंश दियो है। रत्नाकर घर जन्म लियो है॥
॥ चौपाई ॥
करी तपस्या राम को पाऊँ। त्रेता की शक्ति कहलाऊँ॥
॥ चौपाई ॥
कहा राम मणि पर्वत जाओ। कलियुग की देवी कहलाओ॥
॥ चौपाई ॥
विष्णु रूप से कल्की बनकर। लूँगा शक्ति रूप बदलकर॥
॥ चौपाई ॥
तब तक त्रिकुटा घाटी जाओ। गुफा अंधेरी जाकर पाओ॥
॥ चौपाई ॥
काली-लक्ष्मी-सरस्वती माँ। करेंगी शोषण-पार्वती माँ॥
॥ चौपाई ॥
ब्रह्मा, विष्णु, शंकर द्वारे। हनुमत भैरों प्रहरी प्यारे॥
॥ चौपाई ॥
रिद्धि सिद्धि चँवर डुलावें। कलियुग-वासी पूजत आवें॥
॥ चौपाई ॥
पान सुपारी ध्वजा नारियल। चरणामृत चरणों का निर्मल॥
॥ चौपाई ॥
दिया फलित वर माँ मुस्काई। करन तपस्या पर्वत आई॥
॥ चौपाई ॥
कलि काल की भड़की ज्वाला। इक दिन अपना रूप निकाला॥
॥ चौपाई ॥
कन्या बन नगरोटा आई। योगी भैरों दिया दिखाई॥
॥ चौपाई ॥
रूप देख सुन्दर ललचाया। पीछे-पीछे भागा आया॥
॥ चौपाई ॥
कन्याओं के साथ मिली माँ। कौल-कंदौली तभी चली माँ॥
॥ चौपाई ॥
देवा माई दर्शन दीना। पवन रूप हो गई प्रवीणा॥
॥ चौपाई ॥
नवरात्रों में लीला रचाई। भक्त श्रीधर के घर आई॥
॥ चौपाई ॥
योगिन को भण्डारा दीना। सबने रुचिकर भोजन कीना॥
॥ चौपाई ॥
मांस, मदिरा भैरों माँगी। रूप पवन कर इच्छा त्यागी॥
॥ चौपाई ॥
बाण मारकर गंगा निकाली। पर्वत भागी हो मतवाली॥
॥ चौपाई ॥
चरण रखे आ एक शिला जब। चरण-पादुका नाम पड़ा तब॥
॥ चौपाई ॥
पीछे भैरों था बलकारी। छोटी गुफा में जाय पधारी॥
॥ चौपाई ॥
नौ माह तक किया निवासा। चली फोड़कर किया प्रकाशा॥
॥ चौपाई ॥
आद्या शक्ति-ब्रह्म कुमारी। कहलाई माँ आद कुँवारी॥
॥ चौपाई ॥
गुफा द्वार पहुँची मुस्काई। लांगुर वीर ने आज्ञा पाई॥
॥ चौपाई ॥
भागा-भागा भैरों आया। रक्षा हित निज शस्त्र चलाया॥
॥ चौपाई ॥
पड़ा शीश जा पर्वत ऊपर। किया क्षमा जा दिया उसे वर॥
॥ चौपाई ॥
अपने संग में पुजवाऊँगी। भैरों घाटी बनवाऊँगी॥
॥ चौपाई ॥
पहले मेरा दर्शन होगा। पीछे तेरा सुमिरन होगा॥
॥ चौपाई ॥
बैठ गई माँ पिण्डी होकर। चरणों में बहता जल झर-झर॥
॥ चौपाई ॥
चौंसठ योगिनी-भैरों बरवन। सप्तऋषि आ करते सुमिरन॥
॥ चौपाई ॥
घंटा ध्वनि पर्वत पर बाजे। गुफा निराली सुन्दर लागे॥
॥ चौपाई ॥
भक्त श्रीधर पूजन कीना। भक्ति सेवा का वर लीना॥
॥ चौपाई ॥
सेवक ध्यानूँ तुमको ध्याया। ध्वजा व चोला आन चढ़ाया॥
॥ चौपाई ॥
सिंह सदा दर पहरा देता। पंजा शेर का दुःख हर लेता॥
॥ चौपाई ॥
जम्बू द्वीप महाराज मनाया। सर सोने का छत्र चढ़ाया॥
॥ चौपाई ॥
हीरे की मूरत संग प्यारी। जगे अखंड इक जोत तुम्हारी॥
॥ चौपाई ॥
आश्विन चैत्र नवराते आऊँ। पिण्डी रानी दर्शन पाऊँ॥
॥ चौपाई ॥
सेवक 'शर्मा' शरण तिहारी। हरो वैष्णो विपत हमारी॥
॥ दोहा ॥
कलियुग में महिमा तेरी, है माँ अपरम्पार। धर्म की हानि हो रही, प्रगट हो अवतार॥
अर्थ
दोहा
गरुड़ वाहिनी वैष्णवी, त्रिकुटा पर्वत धाम। काली, लक्ष्मी, सरस्वती, शक्ति तुम्हें प्रणाम॥
गरुड़ पर सवार, त्रिकुटा पर्वत पर रहने वाली माँ वैष्णवी! काली, लक्ष्मी और सरस्वती रूपी शक्ति, आपको प्रणाम।
चौपाई 1
नमो नमो वैष्णो वरदानी। कलि काल में शुभ कल्याणी॥
वरदान देने वाली माँ वैष्णो को बार-बार नमस्कार। कलियुग में आप ही शुभ और कल्याण करने वाली हैं।
चौपाई 2
मणि पर्वत पर ज्योति तुम्हारी। पिंडी रूप में हो अवतारी॥
मणि पर्वत पर आपकी ज्योति जलती है। आप पिंडी रूप में प्रकट हुई हैं।
चौपाई 3
देवी देवता अंश दियो है। रत्नाकर घर जन्म लियो है॥
देवी-देवताओं ने अपना अंश देकर आपको रचा। आपने रत्नाकर के घर जन्म लिया।
चौपाई 4
करी तपस्या राम को पाऊँ। त्रेता की शक्ति कहलाऊँ॥
आपने तपस्या की कि मैं राम को पाऊँ और त्रेता युग की शक्ति कहलाऊँ।
चौपाई 5
कहा राम मणि पर्वत जाओ। कलियुग की देवी कहलाओ॥
राम ने कहा — तुम मणि पर्वत पर जाओ और कलियुग की देवी कहलाओ।
चौपाई 6
विष्णु रूप से कल्की बनकर। लूँगा शक्ति रूप बदलकर॥
मैं विष्णु रूप में कल्कि अवतार लेकर, रूप बदलकर तुम्हें शक्ति के रूप में स्वीकार करूँगा।
चौपाई 7
तब तक त्रिकुटा घाटी जाओ। गुफा अंधेरी जाकर पाओ॥
तब तक तुम त्रिकुटा की घाटी में जाओ और वहाँ अंधेरी गुफा में रहो।
चौपाई 8
काली-लक्ष्मी-सरस्वती माँ। करेंगी शोषण-पार्वती माँ॥
वहाँ माँ काली, लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती की शक्तियाँ तुम्हारे साथ रहेंगी।
चौपाई 9
ब्रह्मा, विष्णु, शंकर द्वारे। हनुमत भैरों प्रहरी प्यारे॥
ब्रह्मा, विष्णु और शंकर आपके द्वार पर हैं। हनुमान और भैरों प्यारे पहरेदार हैं।
चौपाई 10
रिद्धि सिद्धि चँवर डुलावें। कलियुग-वासी पूजत आवें॥
रिद्धि और सिद्धि आप पर चँवर डुलाती हैं। कलियुग के लोग आपकी पूजा करने आते हैं।
चौपाई 11
पान सुपारी ध्वजा नारियल। चरणामृत चरणों का निर्मल॥
भक्त पान, सुपारी, ध्वजा और नारियल चढ़ाते हैं, और आपके चरणों का निर्मल चरणामृत पाते हैं।
चौपाई 12
दिया फलित वर माँ मुस्काई। करन तपस्या पर्वत आई॥
माँ ने मुस्कुराकर फल देने वाला वर दिया और तपस्या करने पर्वत पर आ गईं।
चौपाई 13
कलि काल की भड़की ज्वाला। इक दिन अपना रूप निकाला॥
जब कलियुग की आग भड़की, तो एक दिन माँ ने अपना रूप प्रकट किया।
चौपाई 14
कन्या बन नगरोटा आई। योगी भैरों दिया दिखाई॥
माँ एक कन्या बनकर नगरोटा आईं, जहाँ उन्हें योगी भैरों दिखाई दिया।
चौपाई 15
रूप देख सुन्दर ललचाया। पीछे-पीछे भागा आया॥
उनका सुंदर रूप देखकर भैरों के मन में लालच आया और वह उनके पीछे-पीछे भागा।
चौपाई 16
कन्याओं के साथ मिली माँ। कौल-कंदौली तभी चली माँ॥
माँ कन्याओं के साथ मिल गईं और फिर कौल-कंदौली की ओर चल पड़ीं।
चौपाई 17
देवा माई दर्शन दीना। पवन रूप हो गई प्रवीणा॥
देवा माई में दर्शन देकर कुशल माँ पवन का रूप लेकर अदृश्य हो गईं।
चौपाई 18
नवरात्रों में लीला रचाई। भक्त श्रीधर के घर आई॥
नवरात्रि में माँ ने लीला रची और भक्त श्रीधर के घर आईं।
चौपाई 19
योगिन को भण्डारा दीना। सबने रुचिकर भोजन कीना॥
उन्होंने योगियों को भंडारा दिया और सबने स्वादिष्ट भोजन किया।
चौपाई 20
मांस, मदिरा भैरों माँगी। रूप पवन कर इच्छा त्यागी॥
भैरों ने मांस और मदिरा माँगी; माँ ने उसकी इच्छा ठुकराई और पवन रूप में चली गईं।
चौपाई 21
बाण मारकर गंगा निकाली। पर्वत भागी हो मतवाली॥
माँ ने बाण मारकर धरती से गंगा (बाणगंगा) निकाली और मस्ती में पर्वत की ओर बढ़ चलीं।
चौपाई 22
चरण रखे आ एक शिला जब। चरण-पादुका नाम पड़ा तब॥
जब माँ ने एक शिला पर चरण रखे, तो उस स्थान का नाम चरण-पादुका पड़ा।
चौपाई 23
पीछे भैरों था बलकारी। छोटी गुफा में जाय पधारी॥
पीछे बलशाली भैरों आ रहा था, तो माँ एक छोटी गुफा में जा बैठीं।
चौपाई 24
नौ माह तक किया निवासा। चली फोड़कर किया प्रकाशा॥
वहाँ उन्होंने नौ महीने निवास किया, फिर गुफा फोड़कर बाहर निकलीं और प्रकट हुईं।
चौपाई 25
आद्या शक्ति-ब्रह्म कुमारी। कहलाई माँ आद कुँवारी॥
आदिशक्ति, ब्रह्मकुमारी माँ इसीलिए "आदकुँवारी" (अर्धकुँवारी) कहलाईं।
चौपाई 26
गुफा द्वार पहुँची मुस्काई। लांगुर वीर ने आज्ञा पाई॥
माँ मुस्कुराते हुए (भवन की) गुफा के द्वार पर पहुँचीं और लांगुर वीर (हनुमान) को आज्ञा दी।
चौपाई 27
भागा-भागा भैरों आया। रक्षा हित निज शस्त्र चलाया॥
भैरों भागता हुआ वहाँ आया, तो माँ ने रक्षा के लिए अपना शस्त्र चलाया।
चौपाई 28
पड़ा शीश जा पर्वत ऊपर। किया क्षमा जा दिया उसे वर॥
भैरों का सिर कटकर पर्वत के ऊपर जा गिरा। माँ ने उसे क्षमा किया और वर दिया।
चौपाई 29
अपने संग में पुजवाऊँगी। भैरों घाटी बनवाऊँगी॥
"मैं अपने साथ तुम्हारी भी पूजा करवाऊँगी और भैरों घाटी बनवाऊँगी।"
चौपाई 30
पहले मेरा दर्शन होगा। पीछे तेरा सुमिरन होगा॥
"पहले भक्त मेरे दर्शन करेंगे, फिर तुम्हारा स्मरण करेंगे।"
चौपाई 31
बैठ गई माँ पिण्डी होकर। चरणों में बहता जल झर-झर॥
माँ पिंडी रूप में विराजमान हो गईं, और उनके चरणों में झर-झर जल बहता है।
चौपाई 32
चौंसठ योगिनी-भैरों बरवन। सप्तऋषि आ करते सुमिरन॥
चौंसठ योगिनियाँ और भैरों आपका वर्णन करते हैं; सप्तऋषि आकर आपका स्मरण करते हैं।
चौपाई 33
घंटा ध्वनि पर्वत पर बाजे। गुफा निराली सुन्दर लागे॥
पर्वत पर घंटों की ध्वनि गूँजती है। आपकी अनोखी गुफा बहुत सुंदर लगती है।
चौपाई 34
भक्त श्रीधर पूजन कीना। भक्ति सेवा का वर लीना॥
भक्त श्रीधर ने आपकी पूजा की और भक्ति व सेवा का वरदान पाया।
चौपाई 35
सेवक ध्यानूँ तुमको ध्याया। ध्वजा व चोला आन चढ़ाया॥
सेवक ध्यानू भगत ने आपका ध्यान किया और ध्वजा व चोला लाकर चढ़ाया।
चौपाई 36
सिंह सदा दर पहरा देता। पंजा शेर का दुःख हर लेता॥
सिंह सदा आपके द्वार पर पहरा देता है; शेर का पंजा भक्तों के दुःख हर लेता है।
चौपाई 37
जम्बू द्वीप महाराज मनाया। सर सोने का छत्र चढ़ाया॥
जम्मू के महाराज ने आपको मनाया और आपके सिर पर सोने का छत्र चढ़ाया।
चौपाई 38
हीरे की मूरत संग प्यारी। जगे अखंड इक जोत तुम्हारी॥
आपकी प्यारी हीरे की मूर्ति के साथ आपकी एक अखंड ज्योति जलती रहती है।
चौपाई 39
आश्विन चैत्र नवराते आऊँ। पिण्डी रानी दर्शन पाऊँ॥
मैं आश्विन और चैत्र के नवरात्रों में आऊँ और पिंडी रानी के दर्शन पाऊँ।
चौपाई 40
सेवक 'शर्मा' शरण तिहारी। हरो वैष्णो विपत हमारी॥
सेवक 'शर्मा' आपकी शरण में है। हे माँ वैष्णो, हमारी विपत्ति हर लीजिए।
दोहा
कलियुग में महिमा तेरी, है माँ अपरम्पार। धर्म की हानि हो रही, प्रगट हो अवतार॥
हे माँ, कलियुग में आपकी महिमा अपार है। धर्म की हानि हो रही है, इसलिए फिर अवतार लेकर प्रकट होइए।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
वैष्णो देवी चालीसा कब पढ़नी चाहिए?
इसे रोज़ पूजा में पढ़ सकते हैं। परंपरा से चैत्र और आश्विन नवरात्रि, अष्टमी, शुक्रवार और वैष्णो देवी यात्रा के समय इसका पाठ शुभ माना जाता है।
माँ वैष्णो देवी पिंडी रूप में क्यों हैं?
परंपरा के अनुसार भैरों का अंत करने के बाद माँ गुफा में तीन पिंडियों के रूप में स्थित हो गईं, जो महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का रूप मानी जाती हैं।
भैरों घाटी के दर्शन क्यों किए जाते हैं?
चालीसा के अनुसार माँ ने क्षमा माँगने पर भैरों को वर दिया कि पहले माँ के दर्शन होंगे और फिर उसका स्मरण होगा। इसलिए यात्री माँ के दर्शन के बाद भैरों घाटी जाते हैं।