विन्ध्येश्वरी चालीसा — अर्थ सहित
विन्ध्येश्वरी चालीसा माँ विन्ध्यवासिनी की स्तुति है, जिनका प्रसिद्ध धाम उत्तर प्रदेश में मिर्ज़ापुर के पास विन्ध्याचल पर्वत पर है। इसमें देवी के अनेक नामों और रूपों का गुणगान है। नवरात्रि, शुक्रवार और अष्टमी को इसका पाठ विशेष रूप से किया जाता है।
॥ दोहा ॥
नमो नमो विन्ध्येश्वरी, नमो नमो जगदम्ब। सन्तजनों के काज में, करती नहीं विलम्ब॥
॥ चौपाई ॥
जय जय जय विन्ध्याचल रानी। आदि शक्ति जग विदित भवानी॥
॥ चौपाई ॥
सिंहवाहिनी जै जग माता। जै जै जै त्रिभुवन सुखदाता॥
॥ चौपाई ॥
कष्ट निवारिनि जै जग देवी। जै जै सन्त असुर सुर सेवी॥
॥ चौपाई ॥
महिमा अमित अपार तुम्हारी। शेष सहस मुख वर्णत हारी॥
॥ चौपाई ॥
दीनन के दुःख हरत भवानी। नहिं देख्यो तुम सम कोउ दानी॥
॥ चौपाई ॥
सब कर मनसा पुरवत माता। महिमा अमित जगत विख्याता॥
॥ चौपाई ॥
जो जन ध्यान तुम्हारो लावै। सो तुरतहि वांछित फल पावै॥
॥ चौपाई ॥
तुम्हीं वैष्णवी तुम्हीं रुद्रानी। तुम्हीं शारदा अरु ब्रह्मानी॥
॥ चौपाई ॥
रमा राधिका श्यामा काली। तुम्हीं मातु सन्तन प्रतिपाली॥
॥ चौपाई ॥
उमा माधवी चण्डी ज्वाला। बेगि मोहि पर होहु दयाला॥
॥ चौपाई ॥
तुम्हीं हिंगलाज महारानी। तुम्हीं शीतला अरु विज्ञानी॥
॥ चौपाई ॥
दुर्गा दुर्ग विनाशिनी माता। तुम्हीं लक्ष्मी जग सुख दाता॥
॥ चौपाई ॥
तुम्हीं जाह्नवी अरु रुद्रानी। हेमावती अम्ब निर्वानी॥
॥ चौपाई ॥
अष्टभुजी वाराहिनि देवी। करत विष्णु शिव जाकर सेवी॥
॥ चौपाई ॥
चौंसट्ठी देवी कल्यानी। गौरि मंगला सब गुन खानी॥
॥ चौपाई ॥
पाटन मुम्बा दन्त कुमारी। भद्रकालि सुनु विनय हमारी॥
॥ चौपाई ॥
वज्रधारिणी शोक नाशिनी। आयु रक्षिणी विन्ध्यवासिनी॥
॥ चौपाई ॥
जया और विजया बैताली। मातु सुगन्धा अरु विकराली॥
॥ चौपाई ॥
नाम अनन्त तुम्हार भवानी। बरनैं किमि मानुष अज्ञानी॥
॥ चौपाई ॥
जापर कृपा मातु तव होई। तो वह करै चहै मन जोई॥
॥ चौपाई ॥
कृपा करहु मो पर महारानी। सिद्ध करहु अम्बे मम बानी॥
॥ चौपाई ॥
जो नर धरै मातु कर ध्याना। ताकर सदा होय कल्याना॥
॥ चौपाई ॥
विपति ताहि सपनेहु नहिं आवै। जो देवी कर जाप करावै॥
॥ चौपाई ॥
जो नर कहँ ऋण होय अपारा। सो नर पाठ करै शत बारा॥
॥ चौपाई ॥
निश्चय ऋण मोचन होइ जाई। जो नर पाठ करै मन लाई॥
॥ चौपाई ॥
अस्तुति जो नर पढ़ै पढ़ावै। या जग में सो बहु सुख पावै॥
॥ चौपाई ॥
जाको व्याधि सतावै भाई। जाप करत सब दूरि पराई॥
॥ चौपाई ॥
जो नर अति बन्दी महँ होई। बार हजार पाठ करि सोई॥
॥ चौपाई ॥
निश्चय बन्दी ते छुटि जाई। सत्य बचन मम मानहु भाई॥
॥ चौपाई ॥
जापर जो कछु संकट होई। निश्चय देबिहि सुमिरै सोई॥
॥ चौपाई ॥
जा कहँ पुत्र होय नहिं भाई। सो नर या विधि करै उपाई॥
॥ चौपाई ॥
पाँच वर्ष सो पाठ करावै। नौरातर महँ विप्र जिमावै॥
॥ चौपाई ॥
निश्चय होहिं प्रसन्न भवानी। पुत्र देहिं ता कहँ गुन खानी॥
॥ चौपाई ॥
ध्वजा नारियल आनि चढ़ावै। विधि समेत पूजन करवावै॥
॥ चौपाई ॥
नित प्रति पाठ करै मन लाई। प्रेम सहित नहिं आन उपाई॥
॥ चौपाई ॥
यह श्री विन्ध्याचल चालीसा। रंक पढ़त होवै अवनीसा॥
॥ चौपाई ॥
यह जनि अचरज मानहु भाई। कृपा दृष्टि तापर होइ जाई॥
॥ चौपाई ॥
जै जै जै जग मातु भवानी। कृपा करहु मो पर जन जानी॥
अर्थ
दोहा
नमो नमो विन्ध्येश्वरी, नमो नमो जगदम्ब। सन्तजनों के काज में, करती नहीं विलम्ब॥
हे विन्ध्येश्वरी, हे जगदम्बा, आपको बार-बार नमस्कार। आप संतों के काम पूरे करने में देर नहीं करतीं।
चौपाई 1
जय जय जय विन्ध्याचल रानी। आदि शक्ति जग विदित भवानी॥
विन्ध्याचल की रानी की जय हो। आप आदिशक्ति भवानी हैं, जिन्हें सारा जगत जानता है।
चौपाई 2
सिंहवाहिनी जै जग माता। जै जै जै त्रिभुवन सुखदाता॥
सिंह पर सवार जगत-माता की जय हो। तीनों लोकों को सुख देने वाली माँ की जय हो।
चौपाई 3
कष्ट निवारिनि जै जग देवी। जै जै सन्त असुर सुर सेवी॥
कष्ट दूर करने वाली जगत-देवी की जय हो। संत, असुर और देवता — सब आपकी सेवा करते हैं।
चौपाई 4
महिमा अमित अपार तुम्हारी। शेष सहस मुख वर्णत हारी॥
आपकी महिमा असीम और अपार है। हज़ार मुखों वाले शेषनाग भी उसका वर्णन करते-करते हार गए।
चौपाई 5
दीनन के दुःख हरत भवानी। नहिं देख्यो तुम सम कोउ दानी॥
हे भवानी, आप दीन-दुखियों के दुःख हरती हैं। आपके जैसा कोई दाता नहीं देखा।
चौपाई 6
सब कर मनसा पुरवत माता। महिमा अमित जगत विख्याता॥
माँ सबकी मनोकामना पूरी करती हैं। उनकी अपार महिमा संसार में प्रसिद्ध है।
चौपाई 7
जो जन ध्यान तुम्हारो लावै। सो तुरतहि वांछित फल पावै॥
जो व्यक्ति आपका ध्यान करता है, उसे जल्दी ही मनचाहा फल मिलता है।
चौपाई 8
तुम्हीं वैष्णवी तुम्हीं रुद्रानी। तुम्हीं शारदा अरु ब्रह्मानी॥
आप ही वैष्णवी हैं, आप ही रुद्राणी। आप ही शारदा (सरस्वती) और ब्रह्माणी हैं।
चौपाई 9
रमा राधिका श्यामा काली। तुम्हीं मातु सन्तन प्रतिपाली॥
आप ही लक्ष्मी, राधा, श्यामा और काली हैं। हे माँ, आप ही संतों की रक्षा करती हैं।
चौपाई 10
उमा माधवी चण्डी ज्वाला। बेगि मोहि पर होहु दयाला॥
आप उमा, माधवी, चंडी और ज्वाला हैं। मुझ पर जल्दी दया कीजिए।
चौपाई 11
तुम्हीं हिंगलाज महारानी। तुम्हीं शीतला अरु विज्ञानी॥
आप ही हिंगलाज की महारानी हैं। आप ही शीतला और ज्ञान की देवी हैं।
चौपाई 12
दुर्गा दुर्ग विनाशिनी माता। तुम्हीं लक्ष्मी जग सुख दाता॥
आप दुर्गा हैं, जो कठिन संकटों का नाश करती हैं। आप ही लक्ष्मी हैं, जो जगत को सुख देती हैं।
चौपाई 13
तुम्हीं जाह्नवी अरु रुद्रानी। हेमावती अम्ब निर्वानी॥
आप ही गंगा और रुद्राणी हैं। हे माँ, आप हेमावती और मोक्ष देने वाली हैं।
चौपाई 14
अष्टभुजी वाराहिनि देवी। करत विष्णु शिव जाकर सेवी॥
आप आठ भुजाओं वाली वाराही देवी हैं, जिनकी सेवा विष्णु और शिव भी करते हैं।
चौपाई 15
चौंसट्ठी देवी कल्यानी। गौरि मंगला सब गुन खानी॥
आप चौंसठ योगिनियों के रूप में कल्याण करने वाली हैं। आप गौरी और मंगला हैं, सब गुणों की खान।
चौपाई 16
पाटन मुम्बा दन्त कुमारी। भद्रकालि सुनु विनय हमारी॥
आप पाटन की देवी, मुम्बा देवी, दंतेश्वरी और कुमारी हैं। हे भद्रकाली, मेरी विनती सुनिए।
चौपाई 17
वज्रधारिणी शोक नाशिनी। आयु रक्षिणी विन्ध्यवासिनी॥
आप वज्र धारण करने वाली और शोक मिटाने वाली हैं। हे विन्ध्यवासिनी, आप जीवन की रक्षा करती हैं।
चौपाई 18
जया और विजया बैताली। मातु सुगन्धा अरु विकराली॥
आप जया, विजया और बैताली हैं। आप सुगंधा माता और विकराली भी हैं।
चौपाई 19
नाम अनन्त तुम्हार भवानी। बरनैं किमि मानुष अज्ञानी॥
हे भवानी, आपके नाम अनंत हैं। एक अज्ञानी मनुष्य उनका वर्णन कैसे कर सकता है?
चौपाई 20
जापर कृपा मातु तव होई। तो वह करै चहै मन जोई॥
हे माँ, जिस पर आपकी कृपा होती है, वह जो चाहे वह कर सकता है।
चौपाई 21
कृपा करहु मो पर महारानी। सिद्ध करहु अम्बे मम बानी॥
हे महारानी, मुझ पर कृपा कीजिए। हे अम्बे, मेरी वाणी को सफल कीजिए।
चौपाई 22
जो नर धरै मातु कर ध्याना। ताकर सदा होय कल्याना॥
जो व्यक्ति माँ का ध्यान करता है, उसका सदा कल्याण होता है।
चौपाई 23
विपति ताहि सपनेहु नहिं आवै। जो देवी कर जाप करावै॥
जो देवी का जाप करता है, उसके पास विपत्ति सपने में भी नहीं आती।
चौपाई 24
जो नर कहँ ऋण होय अपारा। सो नर पाठ करै शत बारा॥
जिस व्यक्ति पर बहुत भारी कर्ज़ हो, वह इस चालीसा का सौ बार पाठ करे।
चौपाई 25
निश्चय ऋण मोचन होइ जाई। जो नर पाठ करै मन लाई॥
चालीसा कहती है कि जो मन लगाकर पाठ करता है, वह ऋण से मुक्त हो जाता है।
चौपाई 26
अस्तुति जो नर पढ़ै पढ़ावै। या जग में सो बहु सुख पावै॥
जो यह स्तुति पढ़ता और दूसरों से पढ़वाता है, वह इस संसार में बहुत सुख पाता है।
चौपाई 27
जाको व्याधि सतावै भाई। जाप करत सब दूरि पराई॥
जिसे कोई कष्ट या व्याधि सताती हो, भक्त मानते हैं कि जाप करने से वह दूर भाग जाती है।
चौपाई 28
जो नर अति बन्दी महँ होई। बार हजार पाठ करि सोई॥
जो व्यक्ति कठिन बंधन या कैद में हो, वह हज़ार बार पाठ करे।
चौपाई 29
निश्चय बन्दी ते छुटि जाई। सत्य बचन मम मानहु भाई॥
कवि कहते हैं — वह निश्चय ही बंधन से छूट जाएगा, मेरी बात को सत्य मानो।
चौपाई 30
जापर जो कछु संकट होई। निश्चय देबिहि सुमिरै सोई॥
जिस पर कोई भी संकट आए, वह विश्वास के साथ देवी का स्मरण करे।
चौपाई 31
जा कहँ पुत्र होय नहिं भाई। सो नर या विधि करै उपाई॥
जिसके संतान न हो, वह यह उपाय करे।
चौपाई 32
पाँच वर्ष सो पाठ करावै। नौरातर महँ विप्र जिमावै॥
वह पाँच वर्ष तक पाठ करवाए और नवरात्रि में ब्राह्मणों को भोजन कराए।
चौपाई 33
निश्चय होहिं प्रसन्न भवानी। पुत्र देहिं ता कहँ गुन खानी॥
चालीसा के अनुसार भवानी प्रसन्न होकर उसे गुणवान संतान देती हैं।
चौपाई 34
ध्वजा नारियल आनि चढ़ावै। विधि समेत पूजन करवावै॥
माँ को ध्वजा और नारियल चढ़ाए और विधि-विधान से पूजा करवाए।
चौपाई 35
नित प्रति पाठ करै मन लाई। प्रेम सहित नहिं आन उपाई॥
रोज़ मन लगाकर प्रेम से पाठ करे; इसके अलावा कोई और उपाय नहीं चाहिए।
चौपाई 36
यह श्री विन्ध्याचल चालीसा। रंक पढ़त होवै अवनीसा॥
यह श्री विन्ध्याचल चालीसा है; इसे पढ़कर गरीब भी राजा जैसा हो जाता है, ऐसा कहा गया है।
चौपाई 37
यह जनि अचरज मानहु भाई। कृपा दृष्टि तापर होइ जाई॥
इसे आश्चर्य मत मानो — उस पर माँ की कृपा-दृष्टि हो जाती है।
चौपाई 38
जै जै जै जग मातु भवानी। कृपा करहु मो पर जन जानी॥
हे जगत-माता भवानी, आपकी जय हो। मुझे अपना भक्त जानकर मुझ पर कृपा कीजिए।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
विन्ध्येश्वरी चालीसा कब पढ़नी चाहिए?
इसे रोज़ सुबह या शाम पूजा के समय पढ़ सकते हैं। परंपरा से चैत्र और शारदीय नवरात्रि, शुक्रवार और अष्टमी तिथि पर इसका पाठ शुभ माना जाता है।
माँ विन्ध्येश्वरी कौन हैं?
माँ विन्ध्येश्वरी या विन्ध्यवासिनी आदिशक्ति दुर्गा का रूप हैं, जो विन्ध्य पर्वत पर निवास करती हैं। मिर्ज़ापुर के विन्ध्याचल धाम में उनका प्रसिद्ध शक्तिपीठ है।
चालीसा में सौ बार पाठ की बात क्यों है?
चालीसा में कहा गया है कि संकट में पड़ा व्यक्ति सौ बार पाठ करे। भक्त इसे एकाग्र भक्ति का संकल्प मानते हैं; एक बार भी मन से पढ़ना काफ़ी है।