अध्याय 2 · सांख्य योग · श्रीकृष्ण कहते हैं
गीता अध्याय 2, श्लोक 48 — समता ही योग है
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥
yogasthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṃ tyaktvā dhanañjaya | siddhyasiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṃ yoga ucyate ||
अर्थ
हे धनंजय, योग में स्थित होकर, आसक्ति छोड़कर और सफलता-असफलता में समान रहकर कर्म करो। मन की यही समता योग कहलाती है।
आज के जीवन में
पूरे ध्यान से अपना काम करें, और सफलता या असफलता को अपने मन को ऊपर-नीचे न करने दें।