अध्याय 8 · अक्षरब्रह्म योग · श्रीकृष्ण कहते हैं
गीता अध्याय 8, श्लोक 6 — जैसा भाव, वैसी गति
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥
yaṃ yaṃ vāpi smaranbhāvaṃ tyajatyante kalevaram | taṃ tamevaiti kaunteya sadā tadbhāvabhāvitaḥ ||
अर्थ
हे कौन्तेय, मनुष्य अंत समय में जिस-जिस भाव को याद करते हुए शरीर छोड़ता है, वह उसी को पाता है, क्योंकि वह सदा उसी भाव में डूबा रहा होता है।