कांवड़ यात्रा कैसे करें: नियम, कांवड़ के प्रकार और सुरक्षा
संक्षेप में: कांवड़ यात्रा सावन के महीने में शिव भक्तों (कांवड़ियों) की पैदल यात्रा है। वे हरिद्वार, गौमुख, गंगोत्री या सुल्तानगंज जैसे स्थानों से गंगाजल भरकर, बाँस की कांवड़ में कंधे पर रखकर, अपने क्षेत्र के या किसी प्रसिद्ध शिव मंदिर तक ले जाते हैं और शिवलिंग पर अर्पित करते हैं। यात्रा में कांवड़ को ज़मीन पर नहीं रखा जाता, सात्विक आचरण रखा जाता है और 'बोल बम' का जयकारा लगाया जाता है।
एक नज़र में
- कब
- सावन (श्रावण) मास; कई जगह सावन शिवरात्रि को जलाभिषेक
- जल कहाँ से
- हरिद्वार, गौमुख, गंगोत्री, सुल्तानगंज आदि
- प्रमुख मंदिर
- स्थानीय शिव मंदिर, पुरा महादेव, बाबा बैद्यनाथ (देवघर) आदि
- जयकारा
- बोल बम, हर हर महादेव
कांवड़ के प्रकार
- सामान्य कांवड़: रास्ते में आराम के समय कांवड़ को स्टैंड पर टाँगा जा सकता है।
- खड़ी कांवड़: कांवड़ कभी नीचे नहीं रखी जाती; आराम के समय साथी उसे कंधे पर लेकर खड़ा रहता है।
- डाक कांवड़: बिना रुके, दौड़ते हुए, तय समय में जल पहुँचाया जाता है; आमतौर पर टोली में।
- दांडी कांवड़: कुछ भक्त पूरे रास्ते दंडवत (लेटकर प्रणाम) करते हुए जाते हैं।
यात्रा की विधि
- यात्रा से पहले शरीर की तैयारी करें, ख़ासकर लंबी पैदल दूरी के लिए, और परिवार को अपना रास्ता बताएँ।
- गंगा तट पर स्नान करके, संकल्प लेकर, पात्रों में गंगाजल भरें और कांवड़ की पूजा करें।
- 'बोल बम' बोलते हुए कांवड़ कंधे पर लेकर यात्रा शुरू करें।
- रास्ते में कांवड़ को ज़मीन पर न रखें; शिविरों के स्टैंड पर टाँगें।
- मंदिर पहुँचकर स्नान करें और शिवलिंग पर गंगाजल अर्पित करें, फिर घर लौटकर पूजा करें।
क्या करें
- पूरे रास्ते सात्विक भोजन करें और पर्याप्त पानी पिएँ।
- यातायात और पुलिस के निर्देश मानें; सड़क के किनारे तय रास्ते पर चलें।
- रात में चमकीले कपड़े या रिफ़्लेक्टर पहनें और टोली के साथ रहें।
- दूसरे यात्रियों, गाँव वालों और राहगीरों से विनम्र रहें; शिविरों में सफ़ाई रखें।
क्या न करें
- मांस, अंडा, शराब, तंबाकू, गुटखा या कोई नशा न करें; भांग का सेवन भी नहीं।
- कांवड़ को ज़मीन पर न रखें और उसके ऊपर से न लाँघें।
- तेज़ संगीत, झगड़ा या किसी को परेशान न करें; कानून अपने हाथ में न लें।
- चमड़े की चीज़ें, जैसे बेल्ट, न पहनें (प्रचलित नियम)।
- थकान, चक्कर या चोट होने पर यात्रा ज़बरदस्ती न खींचें; मेडिकल कैंप में दिखाएँ।
कांवड़ के नियम क्षेत्र और टोली के अनुसार अलग हैं; अपने गुरु या अनुभवी कांवड़ियों की बात मानें। सेहत और सुरक्षा पहले रखें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कांवड़ यात्रा कब होती है?
सावन (श्रावण) के महीने में, आमतौर पर जुलाई–अगस्त में। उत्तर भारत में कई कांवड़िए सावन शिवरात्रि को जल चढ़ाते हैं।
कांवड़ ज़मीन पर क्यों नहीं रखते?
परंपरा के अनुसार गंगाजल भरी कांवड़ को पवित्र माना जाता है, इसलिए उसे ज़मीन पर रखना अनादर माना जाता है।
डाक कांवड़ क्या है?
इसमें भक्त बिना रुके दौड़ते हुए, अक्सर बारी-बारी से, तय समय में जल मंदिर तक पहुँचाते हैं।
क्या महिलाएँ कांवड़ यात्रा कर सकती हैं?
हाँ, बहुत सी महिलाएँ कांवड़ लाती हैं। सुरक्षा के लिए परिवार या टोली के साथ जाएँ।