महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र — अर्थ सहित
महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र माँ दुर्गा की स्तुति में रचित 21 श्लोकों का अत्यंत लोकप्रिय स्तोत्र है। नवरात्रि, अष्टमी और दशहरे पर मध्यमावती राग में इसे भावपूर्वक गाया जाता है। परंपरा से इसे आदि शंकराचार्य की रचना माना जाता है।
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दनुते गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते। भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१॥
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते। दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥२॥
अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्बवनप्रियवासिनि हासरते शिखरिशिरोमणितुङ्गहिमालयशृङ्गनिजालयमध्यगते। मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥३॥
अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्ड गजाधिपते रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते। निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥४॥
अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते चतुरविचार धुरीण महाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते। दुरितदुराशय दुर्विनिवारण दुर्मदशत्रुनिषूदनते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥५॥
अयि शरणागत वैरिवधूवर वीरवराभय दायकरे त्रिभुवनमस्तक शूलविरोधिशिरोऽधिकृतामल शूलकरे। दुमिदुमितामर दुन्दुभिनाद महोमुखरीकृत तिग्मकरे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥६॥
अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते। शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥७॥
धनुरनुसङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके। कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥८॥
जय जय जप्यजये जयशब्दपरस्तुति तत्परविश्वनुते झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृतनूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते। नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥९॥
अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते। सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१०॥
सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते। शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥११॥
अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते त्रिभुवनभूषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते। अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथ राजसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१२॥
कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले। अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१३॥
करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते। निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१४॥
कटितटपीत दुकूलविचित्र मयूखतिरस्कृत चन्द्ररुचे प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे। जितकनकाचल मौलिपदोर्जित निर्भरकुन्तल वारिरुचे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१५॥
विजितसहस्रकरैक सहस्रकर एक सहस्रकराभरणे कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते। सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१६॥
पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत्। तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१७॥
कनकलसत्कल सिन्धुजलैरनुसिञ्चिनुते गुण रङ्गभुवं भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भ सुखानुभवम्। तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम् जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१८॥
तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते किमु पुरुहूत पुरीन्दु मुखी सुमुखी भवती सुखितेनुभवेत्। ममतु मतं शिवनाम धने भवती कृपया किमुताक्रियते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१९॥
अयि मयि दीनदयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते। यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥२०॥
अयि मयि दीनदयालुतया कृपयानयि त्वत्पदपाथेयं बहुलभवान्ति विचिन्तिमहं तव भव्यकमानयकृत्ये। जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते इति महिषासुरमर्दिनी स्तुतिः पठनात् फलं लभते ॥२१॥
अर्थ
पद 1
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दनुते गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते। भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१॥
हे पर्वतराज की पुत्री! तुमने पृथ्वी को आनंदित किया है, विश्व तुम्हारी लीला से आनंदित है। विन्ध्याचल के शिखर पर वास करने वाली, विष्णु को भी प्रिय, इन्द्र से पूजित, हे भगवती! शिव की कुटुम्बिनी, महान कुटुम्ब वाली — जय हो, जय हो, महिषासुर का वध करने वाली, सुन्दर जटाओं वाली शैलपुत्री।
पद 2
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते। दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥२॥
श्रेष्ठ देवताओं की रक्षा करने वाली, दुर्धर शत्रुओं को दलने वाली, दुष्टों के क्रोध को सहने वाली, हर्ष में रत। तीनों लोकों का पोषण करने वाली, शंकर को प्रसन्न करने वाली, पापों को हरने वाली, नाद में आनंदित। दानवों को क्रोधित करने वाली, दिति के पुत्रों पर क्रोध करने वाली, दुर्मदों को सुखाने वाली, सागर की पुत्री — जय जय।
पद 3
अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्बवनप्रियवासिनि हासरते शिखरिशिरोमणितुङ्गहिमालयशृङ्गनिजालयमध्यगते। मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥३॥
हे जगदम्बा, मेरी माँ! कदम्ब-वन में प्रसन्नता से रहने वाली, हास-विनोद में रत, पर्वतों के शिरोमणि हिमालय के ऊँचे शिखर पर अपने धाम में स्थित। अत्यंत मधुर, मधु और कैटभ का विनाश करने वाली, कैटभ को कुचलने वाली, रास में आनंदित — जय जय।
पद 4
अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्ड गजाधिपते रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते। निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥४॥
हे शत्रु के हाथियों की सूंड को काटने वाली, शत्रु-गज के गण्डस्थल को विदारण करने वाली, शत्रु के सेनापतियों का मुण्ड काटने वाली। अपने भुज-दण्ड से शत्रुओं के खण्ड-खण्ड करने वाली, वीरों के सिर गिराने वाली — जय जय।
पद 5
अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते चतुरविचार धुरीण महाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते। दुरितदुराशय दुर्विनिवारण दुर्मदशत्रुनिषूदनते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥५॥
हे युद्ध में उन्मत्त शत्रुओं को मारने से उत्पन्न गौरव वाली, अजेय देवताओं की शक्ति धारण करने वाली। चतुर विचार की अग्रणी, महाशिव के दूत-कार्य करने वाले प्रमथों की स्वामिनी। दुराचार और दुराशयों का निवारण करने वाली, दुर्मद शत्रुओं का नाश करने वाली — जय जय।
पद 6
अयि शरणागत वैरिवधूवर वीरवराभय दायकरे त्रिभुवनमस्तक शूलविरोधिशिरोऽधिकृतामल शूलकरे। दुमिदुमितामर दुन्दुभिनाद महोमुखरीकृत तिग्मकरे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥६॥
हे शरण में आए हुए वीरों को अभय देने वाली, तीनों भुवनों के ऊपर विरोधियों के मस्तक पर शूल धारण करने वाली। दुंदुभी की ध्वनि से आकाश को गुंजाने वाली, तीव्र किरणों वाली — जय जय।
पद 7
अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते। शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥७॥
हे अपनी हुंकार मात्र से धूम्रलोचन सौ राक्षसों को भगाने वाली। युद्ध में रक्तबीज के रक्त से उत्पन्न असुरों का नाश करने वाली, शुम्भ-निशुम्भ के महायुद्ध में भूत-पिशाचों को तृप्त करने वाली — जय जय।
पद 8
धनुरनुसङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके। कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥८॥
धनुष को सम्भाले, रण के क्षण में साथ, स्फुरित अंगों से नृत्य करती कटके। सुनहरी, पृषत्क-तीरों से भरे तरकश, वीरों के शृंग नाद से घातक शत्रुओं को। चतुरंग बल का युद्धक्षेत्र बनाकर बहु रंगों से भरे युद्ध का शोर — जय जय।
पद 9
जय जय जप्यजये जयशब्दपरस्तुति तत्परविश्वनुते झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृतनूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते। नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥९॥
जय जय, जपने योग्य जय-शब्द से स्तुति में तत्पर, विश्व द्वारा नमित। झन-झन-झिंझिमि की ध्वनि करती नूपुरों से मोहित करने वाली, भूतपति (शिव) की। नटी की भूमिका में नृत्य करने वाली, नटराज की, उत्तम गान में रत — जय जय।
पद 10
अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते। सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१०॥
हे सुमनों (फूलों) की मनोहर कांति से युक्त, रजनी (रात्रि / चंद्रमा) के प्रकाश में आवृत, सुनयनों (सुंदर नेत्रों) वाली, भंवरों की अधिपति — जय जय।
पद 11
सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते। शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥११॥
महान युद्ध में वीर मल्लों से युक्त, मल्लयुद्ध में आनंदित। लताओं और पल्लवों से निर्मित, भिल्ल-झिल्ल जाति के वर्ग से घिरी। प्रफुल्लित और लालिमायुक्त पल्लवों से शोभित — जय जय।
पद 12
अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते त्रिभुवनभूषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते। अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथ राजसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१२॥
गण्डस्थलों से मद बहाते उन्मत्त हाथियों के वृद्ध राजाओं की स्वामिनी। तीनों लोकों का आभूषण, कला-निधि, रूप-सागर, राजकुमारी। सुन्दर दांतों वाले लोगों के मन को लालायित करने वाली, मनमोहक, कामदेव को भी जीतने वाली राजसुते — जय जय।
पद 13
कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले। अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१३॥
कमल की पंखुड़ियों जैसी निर्मल कोमल कांति वाली, कलाओं से विभूषित निर्मल ललाट-लता। सभी विलास-कलाओं का निवास, हंसों के कुल में क्रीड़ा करती। भंवरों और नीलकमल मंडल में, मस्तक पर बकुल फूलों के भंवर — जय जय।
पद 14
करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते। निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१४॥
हाथ की बाँसुरी की मधुर ध्वनि से कोयल को लज्जित करने वाली, मनोहर मति वाली। पुलिंद जाति के साथ मिलकर पर्वत-कुंजों को मनोहर गुंजार से रंजित करने वाली। महाशबरी-गण को अपने गण बनाने वाली, सद्गुणों से युक्त, क्रीड़ाभूमि में — जय जय।
पद 15
कटितटपीत दुकूलविचित्र मयूखतिरस्कृत चन्द्ररुचे प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे। जितकनकाचल मौलिपदोर्जित निर्भरकुन्तल वारिरुचे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१५॥
कटि-तट पर पीले रेशमी वस्त्र धारण किए, अपनी चमक से चंद्रमा को भी फीका करने वाली। देवों और असुरों के प्रणाम करते मुकुट-मणियों से चमकते नखों वाली। सोने के पर्वत (मेरु) के शिखर जैसे पैरों वाली, घने केशों वाली — जय जय।
पद 16
विजितसहस्रकरैक सहस्रकर एक सहस्रकराभरणे कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते। सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१६॥
हजार हाथों से युक्त एक ही जो हजारों हाथों वाले (इंद्र) को जीत लिया, हजारों हाथों से विभूषित। देवताओं को तारने के लिए संग्राम करने वाले तारक के पुत्र (स्कंद) की माता। सुरथ और समाधि की समान समाधि देने वाली, शुभ जन्म में आनंद — जय जय।
पद 17
पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत्। तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१७॥
हे करुणा-निलये सुशिवे! जो प्रतिदिन आपके चरण-कमल की सेवा करता है। हे कमले, कमला के निवास-स्थान! क्या वह भी कमला का घर न बन जाएगा? आपका पद ही परमपद है — इस पर मेरा ध्यान लगा है, हे शिवे — जय जय।
पद 18
कनकलसत्कल सिन्धुजलैरनुसिञ्चिनुते गुण रङ्गभुवं भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भ सुखानुभवम्। तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम् जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१८॥
जो सोने की नदी जैसे जल से गुण-रंगभूमि को सींचता है। क्या वह इंद्राणी (शची) के वक्ष-स्थल के आलिंगन के सुख का अनुभव नहीं करता? आपके चरणों की शरण लेता हूँ, नम्र देव-वाणी में निवास करने वाले शुभ — जय जय।
पद 19
तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते किमु पुरुहूत पुरीन्दु मुखी सुमुखी भवती सुखितेनुभवेत्। ममतु मतं शिवनाम धने भवती कृपया किमुताक्रियते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥१९॥
आपके निर्मल चंद्र-कुल जैसा मुख-चंद्र सभी को शीतल करता है। क्या इंद्र की पुरी में चंद्रमुखी, सुमुखी सुखी न होगी? मेरे मत में शिव-नाम के धनी! क्या आपकी कृपा से यह होगा नहीं? — जय जय।
पद 20
अयि मयि दीनदयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते। यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥२०॥
हे उमे! मुझ दीन पर दयालुता से आपकी कृपा होनी ही चाहिए। हे जगत की माता! जैसी आप हैं, उसी के अनुसार अनुमान करता हूँ। जो यहाँ उचित हो, वह करें और मेरे घोर कष्ट को दूर करें — जय जय।
पद 21
अयि मयि दीनदयालुतया कृपयानयि त्वत्पदपाथेयं बहुलभवान्ति विचिन्तिमहं तव भव्यकमानयकृत्ये। जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते इति महिषासुरमर्दिनी स्तुतिः पठनात् फलं लभते ॥२१॥
हे दीन-दयालु! आपकी कृपा से आपके पद-पाथेय को प्राप्त करूँगा। आपके भव्य कामना-कार्य को मन में धारण करते हुए बहुत कुछ प्राप्त होता है। जय जय हे महिषासुरमर्दिनि — इस महिषासुरमर्दिनी स्तुति का पाठ करने से फल प्राप्त होता है।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
महिषासुरमर्दिनी स्तोत्र किसने लिखा?
परंपरा से इसे आदि शंकराचार्य की रचना माना जाता है। यह 21 श्लोकों का स्तोत्र मध्यमावती राग में गाया जाता है।
इस स्तोत्र का पाठ कब करें?
नवरात्रि के नौ दिनों में, विशेषतः अष्टमी को, तथा दशहरे पर इसका पाठ और गायन किया जाता है। प्रतिदिन माँ दुर्गा की पूजा में भी इसे गाया जा सकता है।
'अयि गिरिनन्दिनि' का अर्थ क्या है?
'अयि' एक संबोधन है जिसका अर्थ है 'हे' या 'ओ'। 'गिरिनन्दिनि' का अर्थ है 'पर्वत (गिरि) की पुत्री (नन्दिनि)' — अर्थात् हिमालयपुत्री पार्वती या दुर्गा।