नवग्रह स्तोत्र — अर्थ सहित
नवग्रह स्तोत्र नौ ग्रहों — सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु — की स्तुति है। ग्रह-पूजा, नवग्रह शांति-पाठ और शनिवार-रविवार की पूजा में इसे पढ़ा जाता है। प्रत्येक श्लोक एक ग्रह के रूप, रंग और गुण का वर्णन करता है।
ब्रह्मा मुरारि त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च। गुरुश्च शुक्रः शनिराहुकेतवः कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥
जपाकुसुमसङ्काशं काश्यपेयं महाद्युतिम्। तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम्॥
दधिशङ्खतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम्। नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम्॥
धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्। कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम्॥
प्रियङ्गुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम्। सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम्॥
देवानां च ऋषीणां च गुरुं काञ्चनसन्निभम्। बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्॥
हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम्। सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम्॥
नीलाञ्जनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥
अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्यविमर्दनम्। सिंहिकागर्भसम्भूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम्॥
पलाशपुष्पसङ्काशं तारकाग्रहमस्तकम्। रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम्॥
अर्थ
पद 1
ब्रह्मा मुरारि त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च। गुरुश्च शुक्रः शनिराहुकेतवः कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्॥
ब्रह्मा, विष्णु (मुरारि) और शिव (त्रिपुरान्तकारी), तथा नौ ग्रह — सूर्य (भानु), चंद्र (शशी), मंगल (भूमिसुत), बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु — ये सभी मिलकर मेरे दिन को सुप्रभात (मंगलमय) करें।
पद 2
जपाकुसुमसङ्काशं काश्यपेयं महाद्युतिम्। तमोऽरिं सर्वपापघ्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम्॥
लाल जपाकुसुम (गुड़हल के फूल) जैसी आभा वाले, कश्यप के पुत्र, महातेजस्वी, अंधकार के शत्रु, समस्त पापों को नष्ट करने वाले दिवाकर (सूर्यदेव) को मैं प्रणाम करता हूँ।
पद 3
दधिशङ्खतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम्। नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम्॥
दही, शंख और बर्फ जैसी श्वेत आभा वाले, क्षीर-समुद्र से उत्पन्न, शिव के मुकुट की शोभा बढ़ाने वाले शशि (चंद्रमा) को मैं नमन करता हूँ।
पद 4
धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्। कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम्॥
पृथ्वी के गर्भ से उत्पन्न, बिजली जैसी चमकीली कांति वाले, हाथ में शक्ति (भाला) धारण किए कुमार मंगल को मैं प्रणाम करता हूँ।
पद 5
प्रियङ्गुकलिकाश्यामं रूपेणाप्रतिमं बुधम्। सौम्यं सौम्यगुणोपेतं तं बुधं प्रणमाम्यहम्॥
प्रियंगु के फूल की कली जैसे श्याम रंग वाले, अतुलनीय सौंदर्य के धनी, सौम्य स्वभाव और सौम्य गुणों से युक्त बुध को मैं प्रणाम करता हूँ।
पद 6
देवानां च ऋषीणां च गुरुं काञ्चनसन्निभम्। बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्॥
देवताओं और ऋषियों के गुरु, सोने जैसी आभा वाले, बुद्धि के स्वरूप और तीनों लोकों के स्वामी बृहस्पति को मैं नमन करता हूँ।
पद 7
हिमकुन्दमृणालाभं दैत्यानां परमं गुरुम्। सर्वशास्त्रप्रवक्तारं भार्गवं प्रणमाम्यहम्॥
बर्फ, कुंद-पुष्प और कमलनाल जैसी श्वेत आभा वाले, दैत्यों के परम गुरु, समस्त शास्त्रों के प्रवक्ता भृगुपुत्र शुक्र को मैं प्रणाम करता हूँ।
पद 8
नीलाञ्जनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥
नीले अंजन जैसी आभा वाले, सूर्य के पुत्र, यम के बड़े भाई, छाया और मार्तण्ड (सूर्य) से उत्पन्न शनैश्चर को मैं नमन करता हूँ।
पद 9
अर्धकायं महावीर्यं चन्द्रादित्यविमर्दनम्। सिंहिकागर्भसम्भूतं तं राहुं प्रणमाम्यहम्॥
आधे शरीर वाले, महान पराक्रमी, चंद्र और सूर्य को ग्रसने वाले, सिंहिका के गर्भ से उत्पन्न राहु को मैं प्रणाम करता हूँ।
पद 10
पलाशपुष्पसङ्काशं तारकाग्रहमस्तकम्। रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम्॥
पलाश के फूल जैसी आभा वाले, तारों और ग्रहों के शीर्ष पर स्थित, उग्र, उग्र स्वभाव वाले और भयंकर केतु को मैं प्रणाम करता हूँ।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
नवग्रह स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?
नवग्रह पूजा, शांति-पाठ, शनिवार (शनि के लिए) और रविवार (सूर्य के लिए) को इसका पाठ विशेष फलदायी होता है। ग्रह-दोष निवारण के लिए भी इसे नित्य पढ़ा जाता है।
'ब्रह्मा मुरारि त्रिपुरान्तकारी' किस ग्रंथ से है?
यह श्लोक नवग्रह वंदना के रूप में स्वतंत्र रूप से प्रसिद्ध है। इसमें त्रिदेवों सहित नौ ग्रहों का एक साथ स्मरण कर मंगल-कामना की जाती है।
नवग्रह कौन-कौन हैं?
नवग्रह हैं: सूर्य (Sun), चंद्र (Moon), मंगल (Mars), बुध (Mercury), गुरु/बृहस्पति (Jupiter), शुक्र (Venus), शनि (Saturn), राहु और केतु — ये नौ ग्रह हिंदू ज्योतिष में जीवन को प्रभावित करने वाले मुख्य ग्रह माने जाते हैं।