नवग्रह चालीसा — अर्थ सहित

नवग्रह चालीसा नौ ग्रह देवताओं — सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु — की स्तुति है। हर ग्रह के लिए चार चौपाइयाँ हैं। चालीसा के अनुसार इसके रचयिता सुन्दरदास हैं। भक्त इसे ग्रह-शांति की भावना से, विशेषकर रविवार या शनिवार को पढ़ते हैं।

40 चौपाई · लगभग 8 मिनट

॥ दोहा ॥

श्री गणपति गुरुपद कमल, प्रेम सहित सिरनाय। नवग्रह चालीसा कहत, शारद होत सहाय॥

॥ दोहा ॥

जय जय रवि शशि सोम बुध, जय गुरु भृगु शनि राज। जयति राहु अरु केतु ग्रह, करहु अनुग्रह आज॥

॥ चौपाई ॥

प्रथमहि रवि कहँ नावौं माथा। करहु कृपा जनि जानि अनाथा॥

॥ चौपाई ॥

हे आदित्य दिवाकर भानू। मैं मति मन्द महा अज्ञानू॥

॥ चौपाई ॥

अब निज जन कहँ हरहु कलेषा। दिनकर द्वादश रूप दिनेशा॥

॥ चौपाई ॥

नमो भास्कर सूर्य प्रभाकर। अर्क मित्र अघ मोघ क्षमाकर॥

॥ चौपाई ॥

शशि मयंक रजनीपति स्वामी। चन्द्र कलानिधि नमो नमामी॥

॥ चौपाई ॥

राकापति हिमांशु राकेशा। प्रणवत जन तन हरहु कलेशा॥

॥ चौपाई ॥

सोम इन्दु विधु शान्ति सुधाकर। शीत रश्मि औषधि निशाकर॥

॥ चौपाई ॥

तुम्हीं शोभित सुन्दर भाल महेशा। शरण शरण जन हरहु कलेशा॥

॥ चौपाई ॥

जय जय जय मंगल सुखदाता। लोहित भौमादिक विख्याता॥

॥ चौपाई ॥

अंगारक कुज रुज ऋणहारी। करहु दया यही विनय हमारी॥

॥ चौपाई ॥

हे महिसुत छितिसुत सुखराशी। लोहितांग जय जन अघनाशी॥

॥ चौपाई ॥

अगम अमंगल अब हर लीजै। सकल मनोरथ पूरण कीजै॥

॥ चौपाई ॥

जय शशि नन्दन बुध महाराजा। करहु सकल जन कहँ शुभ काजा॥

॥ चौपाई ॥

दीजै बुद्धि बल सुमति सुजाना। कठिन कष्ट हरि करि कल्याणा॥

॥ चौपाई ॥

हे तारासुत रोहिणी नन्दन। चन्द्रसुवन दुख द्वन्द्व निकन्दन॥

॥ चौपाई ॥

पूजहु आस दास कहँ स्वामी। प्रणत पाल प्रभु नमो नमामी॥

॥ चौपाई ॥

जयति जयति जय श्री गुरुदेवा। करौं सदा तुम्हरी प्रभु सेवा॥

॥ चौपाई ॥

देवाचार्य तुम देव गुरु ज्ञानी। इन्द्र पुरोहित विद्यादानी॥

॥ चौपाई ॥

वाचस्पति बागीश उदारा। जीव बृहस्पति नाम तुम्हारा॥

॥ चौपाई ॥

विद्या सिन्धु अंगिरा नामा। करहु सकल विधि पूरण कामा॥

॥ चौपाई ॥

शुक्र देव पद तल जल जाता। दास निरन्तर ध्यान लगाता॥

॥ चौपाई ॥

हे उशना भार्गव भृगु नन्दन। दैत्य पुरोहित दुष्ट निकन्दन॥

॥ चौपाई ॥

भृगुकुल भूषण दूषण हारी। हरहु नेष्ट ग्रह करहु सुखारी॥

॥ चौपाई ॥

तुहि द्विजवर जोशी सिरताजा। नर शरीर के तुमहीं राजा॥

॥ चौपाई ॥

जय श्री शनिदेव रवि नन्दन। जय कृष्णो सौरी जगवन्दन॥

॥ चौपाई ॥

पिंगल मन्द रौद्र यम नामा। वप्र आदि कोणस्थ ललामा॥

॥ चौपाई ॥

वक्र दृष्टि पिप्पल तन साजा। क्षण महँ करत रंक क्षण राजा॥

॥ चौपाई ॥

ललत स्वर्ण पद करत निहाला। हरहु विपत्ति छाया के लाला॥

॥ चौपाई ॥

जय जय राहु गगन प्रविसइया। तुमही चन्द्र आदित्य ग्रसइया॥

॥ चौपाई ॥

रवि शशि अरि स्वर्भानु धारा। शिखी आदि बहु नाम तुम्हारा॥

॥ चौपाई ॥

सैंहिकेय तुम निशाचर राजा। अर्धकाय जग राखहु लाजा॥

॥ चौपाई ॥

यदि ग्रह समय पाय कहिं आवहु। सदा शान्ति और सुख उपजावहु॥

॥ चौपाई ॥

जय श्री केतु कठिन दुखहारी। करहु सुजन हित मंगलकारी॥

॥ चौपाई ॥

ध्वजयुत रुण्ड रूप विकराला। घोर रौद्रतन अघमन काला॥

॥ चौपाई ॥

शिखी तारिका ग्रह बलवाना। महा प्रताप न तेज ठिकाना॥

॥ चौपाई ॥

वाहन मीन महा शुभकारी। दीजै शान्ति दया उर धारी॥

॥ चौपाई ॥

तीरथराज प्रयाग सुपासा। बसै राम के सुन्दर दासा॥

॥ चौपाई ॥

ककरा ग्रामहिं पुरे-तिवारी। दुर्वासाश्रम जन दुख हारी॥

॥ चौपाई ॥

नवग्रह शान्ति लिख्यो सुख हेतु। जन तन कष्ट उतारण सेतू॥

॥ चौपाई ॥

जो नित पाठ करै चित लावै। सब सुख भोगि परम पद पावै॥

॥ दोहा ॥

धन्य नवग्रह देव प्रभु, महिमा अगम अपार। चित नव मंगल मोद गृह, जगत जनन सुखद्वार॥

॥ दोहा ॥

यह चालीसा नवोग्रह, विरचित सुन्दरदास। पढ़त प्रेम सुत बढ़त सुख, सर्वानन्द हुलास॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

नवग्रह चालीसा कब पढ़नी चाहिए?

इसे रोज़ सुबह स्नान के बाद पढ़ सकते हैं। कई भक्त रविवार या शनिवार को, या ग्रह-शांति पूजा के साथ इसका पाठ करते हैं।

नवग्रह कौन-कौन से हैं?

सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति (गुरु), शुक्र, शनि, राहु और केतु। हिंदू परंपरा में इन्हें देवता मानकर पूजा जाता है।

नवग्रह चालीसा किसने लिखी?

अंतिम दोहे में इसके रचयिता का नाम सुन्दरदास बताया गया है। चालीसा में प्रयाग के पास ककरा गाँव और दुर्वासा आश्रम का भी उल्लेख है।

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