पुरुष सूक्तम् — अर्थ सहित
पुरुष सूक्त ऋग्वेद (मंडल 10, सूक्त 90) का प्रसिद्ध सूक्त है, जिसके ऋषि नारायण माने जाते हैं। इसमें हज़ारों सिर, आँखों और पैरों वाले विराट पुरुष का वर्णन है, जिनसे सारी सृष्टि बनी। विष्णु पूजा, अभिषेक और सत्यनारायण पूजा में इसका पाठ होता है।
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥१॥
पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्। उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति॥२॥
एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्च पूरुषः। पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥३॥
त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः। ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि॥४॥
तस्माद्विराळजायत विराजो अधि पूरुषः। स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः॥५॥
यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत। वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः॥६॥
तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन्पुरुषं जातमग्रतः। तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये॥७॥
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम्। पशून्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्यान्ग्राम्याश्च ये॥८॥
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे। छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत॥९॥
तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः॥१०॥
यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्। मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरू पादा उच्येते॥११॥
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः। ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥१२॥
चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत। मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत॥१३॥
नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत। पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन्॥१४॥
सप्तास्यासन्परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः। देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन्पुरुषं पशुम्॥१५॥
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥१६॥
अर्थ
पद 1
सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्॥१॥
विराट पुरुष के हज़ारों सिर, हज़ारों आँखें और हज़ारों पैर हैं। वे पूरी पृथ्वी को हर ओर से घेरकर भी उससे दस अंगुल आगे तक फैले हैं।
पद 2
पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यम्। उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति॥२॥
जो कुछ हो चुका है और जो होने वाला है, वह सब यह पुरुष ही है। वे अमरता के भी स्वामी हैं और अन्न से बढ़ने वाले इस संसार से भी ऊपर हैं।
पद 3
एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्च पूरुषः। पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि॥३॥
यह सारा विस्तार उनकी महिमा है, पर पुरुष इससे भी बड़े हैं। सारे प्राणी उनका केवल एक चौथाई भाग हैं; बाकी तीन भाग अमर रूप में स्वर्ग में हैं।
पद 4
त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः। ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि॥४॥
पुरुष के तीन भाग ऊपर उठे रहे, और एक भाग यहाँ संसार बनकर बार-बार प्रकट होता है। उसी से वे खाने वाले (जीव) और न खाने वाले (जड़) सब में चारों ओर फैल गए।
पद 5
तस्माद्विराळजायत विराजो अधि पूरुषः। स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः॥५॥
उस पुरुष से विराट (ब्रह्मांड) उत्पन्न हुआ, और विराट से फिर पुरुष प्रकट हुए। जन्म लेकर वे पृथ्वी से आगे और पीछे — हर ओर — फैल गए।
पद 6
यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत। वसन्तो अस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः॥६॥
जब देवताओं ने पुरुष को ही आहुति मानकर यज्ञ किया, तब वसंत ऋतु उसका घी बनी, ग्रीष्म उसकी समिधा (लकड़ी) और शरद उसकी हवि (आहुति)।
पद 7
तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन्पुरुषं जातमग्रतः। तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये॥७॥
सबसे पहले जन्मे उस यज्ञ रूप पुरुष पर उन्होंने कुशा के आसन पर जल छिड़का। उसी से देवताओं, साध्यों और ऋषियों ने यज्ञ किया।
पद 8
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम्। पशून्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्यान्ग्राम्याश्च ये॥८॥
उस सर्वहुत (जिसमें सब कुछ अर्पित हुआ) यज्ञ से दही मिला घी इकट्ठा हुआ। उसी से आकाश के पक्षी, जंगल के और गाँव के पशु बने।
पद 9
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे। छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत॥९॥
उसी सर्वहुत यज्ञ से ऋचाएँ (ऋग्वेद) और साम (सामवेद) उत्पन्न हुए। उसी से छंद जन्मे और उसी से यजुर्वेद प्रकट हुआ।
पद 10
तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः। गावो ह जज्ञिरे तस्मात्तस्माज्जाता अजावयः॥१०॥
उसी से घोड़े और दोनों जबड़ों में दाँत वाले पशु उत्पन्न हुए। उसी से गाएँ जन्मीं और उसी से बकरियाँ और भेड़ें।
पद 11
यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन्। मुखं किमस्य कौ बाहू का ऊरू पादा उच्येते॥११॥
जब उन्होंने पुरुष की रचना का विभाजन किया, तो कितने रूपों में किया? उनका मुख क्या था, भुजाएँ क्या थीं, जाँघें और पैर क्या कहे गए?
पद 12
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्बाहू राजन्यः कृतः। ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रो अजायत॥१२॥
सूक्त कहता है कि उनका मुख ब्राह्मण बना, भुजाएँ क्षत्रिय, जाँघें वैश्य और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए — समाज को एक ही विराट शरीर के अंगों के रूप में देखा गया है।
पद 13
चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत। मुखादिन्द्रश्चाग्निश्च प्राणाद्वायुरजायत॥१३॥
उनके मन से चंद्रमा जन्मा, आँखों से सूर्य। मुख से इंद्र और अग्नि उत्पन्न हुए, और प्राण से वायु।
पद 14
नाभ्या आसीदन्तरिक्षं शीर्ष्णो द्यौः समवर्तत। पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँ अकल्पयन्॥१४॥
उनकी नाभि से अंतरिक्ष बना, सिर से स्वर्ग, पैरों से पृथ्वी और कानों से दिशाएँ। इस तरह देवताओं ने सब लोकों की रचना की।
पद 15
सप्तास्यासन्परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः। देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन्पुरुषं पशुम्॥१५॥
जब देवताओं ने यज्ञ फैलाया और पुरुष को ही आहुति रूप में बाँधा, तब उस यज्ञ की सात सीमाएँ (परिधि) थीं और इक्कीस समिधाएँ बनाई गईं।
पद 16
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥१६॥
देवताओं ने यज्ञ के द्वारा यज्ञ रूप पुरुष की पूजा की; यही पहले धर्म (नियम) बने। इस महिमा से वे उस स्वर्ग को पहुँचे जहाँ पहले के साध्य देवता रहते हैं।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पुरुष सूक्त का पाठ कब करें?
विष्णु और नारायण की पूजा, अभिषेक, सत्यनारायण कथा, गृह प्रवेश और यज्ञ में इसका पाठ होता है। एकादशी और गुरुवार को भी भक्त इसे पढ़ते हैं।
पुरुष सूक्त का पाठ कैसे करें?
यह वैदिक सूक्त है, इसलिए परंपरा में इसे स्वर (उदात्त-अनुदात्त) के साथ गुरु से सीखकर गाया जाता है। सामान्य भक्त स्नान के बाद भगवान विष्णु के सामने शांत मन से साफ़ उच्चारण के साथ पढ़ सकते हैं।
पुरुष सूक्त किस वेद में है?
यह ऋग्वेद के दसवें मंडल का 90वाँ सूक्त है। थोड़े अंतर के साथ यह यजुर्वेद और अथर्ववेद में भी मिलता है; दक्षिण भारत में तैत्तिरीय आरण्यक वाला रूप भी गाया जाता है।