जय पार्वती माता आरती — अर्थ सहित
'जय पार्वती माता' माँ पार्वती की सुप्रसिद्ध आरती है। इसमें उन्हें जगत की माता, शत्रु-कुल की नाशिनी और भक्तों की रक्षक बताया गया है। यह आरती हरितालिका तीज, नवरात्रि और सोमवार की शिव-पार्वती पूजा के अंत में गाई जाती है।
जय पार्वती माता, मैया जय पार्वती माता। ब्रह्मा सनातन सुन्दर, पर ब्रह्म की धाता॥
अरिकुल पद्मा विनाशिनी, जय सेवक त्राता। जग जीवन जगदम्बा, हर-बिन जग माता॥
सिंह का आसन जिनका, चामर ढुलाता। सोने के थाल विराजत, धूप-दीप जलाता॥
अर्थ
पद 1
जय पार्वती माता, मैया जय पार्वती माता। ब्रह्मा सनातन सुन्दर, पर ब्रह्म की धाता॥
हे पार्वती माता, आपकी जय हो। आप सनातन और परम सुन्दर हैं तथा परब्रह्म को धारण करने वाली शक्ति हैं।
पद 2
अरिकुल पद्मा विनाशिनी, जय सेवक त्राता। जग जीवन जगदम्बा, हर-बिन जग माता॥
शत्रु-कुल का नाश करने वाली और भक्तों की रक्षा करने वाली माता की जय हो। वे संपूर्ण जगत की जीवन-शक्ति जगदम्बा हैं और शिव (हर) के साथ इस सृष्टि की माता हैं।
पद 3
सिंह का आसन जिनका, चामर ढुलाता। सोने के थाल विराजत, धूप-दीप जलाता॥
माँ सिंह के आसन पर विराजती हैं और उनके ऊपर चँवर डुलाया जाता है। सोने के थाल में धूप और दीपक जलाकर उनकी पूजा-आरती की जाती है।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
पार्वती जी की आरती कब गाई जाती है?
यह आरती हरितालिका तीज, सोमवार की शिव-पार्वती पूजा, नवरात्रि और किसी भी पार्वती-पूजन के अंत में गाई जाती है।
पार्वती जी की आरती का क्या महत्व है?
परंपरा के अनुसार माँ पार्वती की आरती भक्ति से गाने पर सुहाग, संतान और पारिवारिक सुख की प्राप्ति होती है। सुहागिन महिलाएँ विशेष रूप से तीज व्रत पर इसे गाती हैं।
पार्वती जी और दुर्गा जी में क्या संबंध है?
परंपरा में पार्वती, दुर्गा और काली एक ही आदि-शक्ति के भिन्न स्वरूप हैं। पार्वती उनका सौम्य माता-रूप हैं जो शिव की सहधर्मिणी हैं, जबकि दुर्गा और काली उनके शक्तिशाली एवं युद्ध-रूप हैं।