पार्वती चालीसा — अर्थ सहित

पार्वती चालीसा माँ पार्वती की भक्तिमय स्तुति है। वे हिमालय-पुत्री, शिव की अर्धांगिनी और गणेश-कार्तिकेय की माता हैं। उनके उमा, गौरी, अम्बिका और भवानी जैसे अनेक नाम हैं। हरियाली तीज, हरितालिका तीज, नवरात्रि और सोमवार को इस चालीसा का पाठ विशेष फलदायी माना जाता है।

33 चौपाई, 3 दोहे · लगभग 7 मिनट

॥ दोहा ॥

श्री गणेश गुरुपाद नमूँ, नमूँ शिव-अर्धांगिनी। पार्वती-माँ की महिमा, गाऊँ भाव-तरंगिनी॥

॥ दोहा ॥

जय उमा जय गिरिजा माय, जय हिमवत-दुलारी। जो ध्यावे तुमको मन से, वह पाए सुख भारी॥

॥ चौपाई ॥

जय पार्वती हिमाचल-बाला। जय शिव-प्रिया जय सुख-निवाला॥ गौरवर्णा तन अति सुकुमारी। रूप-लावण्य से जग उजियारी॥

॥ चौपाई ॥

चार भुजा में अस्त्र-शस्त्र। कमल-पुष्प धारे हो नेत्र-पत्र॥ रत्न-जड़ित मुकुट सिर सोहे। देखत जन सब मन को मोहे॥

॥ चौपाई ॥

सिंह-वाहिनी और दुर्गा-रूपा। महिषासुर-मर्दिनी अनूपा॥ काली-रूप में असुर-संहारी। सौम्य-रूप में जग-हितकारी॥

॥ चौपाई ॥

हिमवान और मेना के घर में। प्रगट भयी तुम पुण्य-निधर में॥ पूर्व जन्म में सती थीं माता। दक्ष-यज्ञ में तन त्यागा-ज्ञाता॥

॥ चौपाई ॥

शिव को पति पाने की चाहा। तुमने किया महातप-साहा॥ नंगे पाँव पाषाण पर रहीं। केवल पत्ते खाकर तुमने सहीं॥

॥ चौपाई ॥

पत्ता भी जब छोड़ दिया। अपर्णा नाम तुम्हें दिया॥ ऋषि और मुनि तप देखकर। शिव प्रसन्न हुए तप-ताप सहकर॥

॥ चौपाई ॥

शिव ने भेजे सप्त-ऋषि तब। परीक्षा लेने को तुम्हारी जब॥ ऋषिगण बोले मत करो तप। पर तुम अटल रहीं, न डिगा नप॥

॥ चौपाई ॥

शिव आए खुद बालक-रूपा। निंदा की उनकी तुम्हें अनूपा॥ तुम रुष्ट हुई कहा — लो विदा। शिव प्रकट हुए, टूटी परीक्षा-बाधा॥

॥ चौपाई ॥

शिव-पार्वती का शुभ-विवाह। महाशिवरात्रि-दिन की राह॥ हिमवान ने कन्यादान दिया। त्रिभुवन ने मंगल-गान किया॥

॥ चौपाई ॥

शिव के वाम-अंग में बसीं। अर्धनारीश्वर-रूप में हसीं॥ शिव की शक्ति, शक्ति के शिव। दोनों मिलकर हैं अखंड-शिव॥

॥ चौपाई ॥

गणेश को माता ने बनाया। हल्दी-मिट्टी से जीवन दिलाया॥ शिव-गण से रक्षा का काज। गणेश बने द्वारपाल-महाराज॥

॥ चौपाई ॥

कार्तिकेय हैं तुम्हारे लाल। षण्मुख-स्कंद महा विशाल॥ गंगा की धारा में पले। कृत्तिकाओं ने उनको पाले॥

॥ चौपाई ॥

उमा नाम से जग में पूजित। गौरी नाम से भक्त-सुपूजित॥ हैमवती नाम से जग-जननी। भवानी भव-बाधा-हर्षदायिनी॥

॥ चौपाई ॥

शाकम्भरी और ब्राह्मणी। चण्डिका और महामारी-रणी॥ एक ही शक्ति अनेक रूपा। युग-युग में प्रगटत हो अनूपा॥

॥ चौपाई ॥

नवरात्रि में नव-रूप तुम्हारे। नव-दुर्गा के नव-रूप न्यारे॥ शैलपुत्री से महागौरी तक। भक्तों को दो नव-आशीष तक॥

॥ चौपाई ॥

तीज के दिन सुहागन पूजे। शिव-पार्वती की जोड़ी भूले न भूजे॥ पति की दीर्घायु की कामना। पार्वती-कृपा से पूर्ण करना॥

॥ चौपाई ॥

हरियाली तीज और हरितालिका। दोनों तीज में तुम हो पालिका॥ सावन में सोमवार का व्रत। पार्वती की पूजा-भक्ति-कृत॥

॥ चौपाई ॥

कुँवारी कन्या मनवांछित वर। पार्वती-पूजन से पाए घर॥ सौभाग्य और सुखी-दाम्पत्य। पार्वती-कृपा से मिले सत्य॥

॥ चौपाई ॥

संतान की कामना करने वाले। पार्वती-पूजन से फल पाले॥ गणेश-माता की स्तुति जो करे। घर में सुख-समृद्धि को वह वरे॥

॥ चौपाई ॥

विद्या-बुद्धि और सुशीलता। पार्वती की कृपा से मिले कलता॥ सत्य-धर्म और करुणा-भाव। माँ पार्वती का है यही स्वभाव॥

॥ चौपाई ॥

शिव की तपस्या रोकन को। देवों ने भेजा कामदेव को॥ काम-शर से शिव क्रुद्ध हुए। कामदेव तत्काल भस्म हुए॥

॥ चौपाई ॥

पार्वती ने ली रति को छाती। रती-विलाप सुन शिव का मन माती॥ रति-प्रार्थना सुन शिव ने दिया। काम को पुनर्जीवन-वरदान किया॥

॥ चौपाई ॥

दुर्गम-काल में अन्न-वर्षा। शाकम्भरी-रूप से दी धरा॥ भक्तों की भूख-प्यास हर्षित। शक्ति-रूपा माँ सदा समर्पित॥

॥ चौपाई ॥

शुम्भ-निशुम्भ वध तुमने किया। मधु-कैटभ को भी दंड दिया॥ रक्तबीज का रक्त पी गईं। काली-रूप में विजय-श्री पाईं॥

॥ चौपाई ॥

जो तीज-व्रत माँ का करे। सुहागिन नित-शुभ सुख वरे॥ सत्रह साल का तीज-व्रत किया। पार्वती ने शिव को पति लिया॥

॥ चौपाई ॥

सोमवार का व्रत जो करे। शिव-पार्वती की कृपा को वरे॥ महाशिवरात्रि पर पूजन करें। दाम्पत्य-सुख और शांति वरें॥

॥ चौपाई ॥

पार्वती की कृपा से ज्ञान मिले। शिव-पंचाक्षर-रहस्य खिले॥ आत्म-ज्ञान और विवेक-सार। माँ की शरण में पाए पार॥

॥ चौपाई ॥

रोग-शोक और क्लेश-जाल। माँ की शरण में कटे काल॥ भय और दारिद्र्य दूर भागे। जब पार्वती-पूजन में मन लागे॥

॥ चौपाई ॥

गौरी-पूजन में बेल-पत्र। फूल-धूप-दीप-नैवेद्य-यंत्र॥ लाल वस्त्र और लाल पुष्प चढ़ाएँ। पार्वती-कृपा का वरण पाएँ॥

॥ चौपाई ॥

शक्ति-पीठ में जो दर्शन करे। पार्वती की उपस्थिति को वरे॥ इक्यावन शक्ति-पीठ की यात्रा। पावन करे मन की हर विरात्रा॥

॥ चौपाई ॥

ब्रह्मा-विष्णु-शिव मिलकर तुम्हें। जगत-जननी कहते आदर से॥ देव-देवी सब तुम्हारे आगे। प्रणाम करते मन-भाव जागे॥

॥ चौपाई ॥

जो यह पाठ करे मन लाई। ता पर होत माँ की सहाई॥ ऋतु-पर्व पर पाठ जो करे। पार्वती-कृपा का फल वह वरे॥

॥ चौपाई ॥

जय जय पार्वती जग-जननी। जय उमा-शिव-अर्धांगिनी। जय हिमवत-दुलारी माया। जय त्रिभुवन-ईश्वरी-सुख-छाया॥

॥ दोहा ॥

पार्वती-चालीसा यह पाठ, नित पढ़े जो लाय ध्यान। उमा-कृपा से उस जन को, मिले मोक्ष-कल्याण॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पार्वती चालीसा कब पढ़नी चाहिए?

इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा में सोमवार, हरियाली तीज, हरितालिका तीज, नवरात्रि और महाशिवरात्रि विशेष शुभ माने जाते हैं। विवाह की कामना वाली कन्याएँ और सुहागिनें दोनों इसका पाठ करती हैं।

तीज पर पार्वती की पूजा का क्या महत्त्व है?

परंपरा के अनुसार पार्वती ने खुद शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया था और तीज व्रत रखा था। इसलिए सुहागिनें अपने पति की दीर्घायु और कुँवारी कन्याएँ मनवांछित वर के लिए इस दिन पार्वती का पूजन करती हैं।

पार्वती पूजन में क्या अर्पित करें?

परंपरागत रूप से लाल फूल, बेलपत्र, लाल वस्त्र, सुहाग की सामग्री (चूड़ियाँ, सिंदूर, महावर), फल और मिठाई अर्पित की जाती है। धूप-दीप जलाएँ और पार्वती चालीसा या मंगलगौरी व्रत कथा का पाठ करें।

पार्वती चालीसा पढ़ने से क्या लाभ होता है?

भक्तों का विश्वास है कि श्रद्धा से पाठ करने पर वैवाहिक जीवन में सुख, मन की शांति, संतान का आशीर्वाद और बाधाओं से मुक्ति मिलती है। पार्वती करुणा और शक्ति की देवी हैं — उनकी भक्ति से जीवन के कठिन पड़ावों में धैर्य और बल मिलता है।

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