जय संतोषी माता आरती — अर्थ सहित

'जय संतोषी माता' संतोष और सुख देने वाली माँ संतोषी की आरती है। इसमें उनके सुनहरे वस्त्र, गुड़-चने के प्रिय भोग और शुक्रवार के व्रत का वर्णन है। शुक्रवार के व्रत में कथा सुनने के बाद और सोलह शुक्रवार के उद्यापन पर यह आरती गाई जाती है।

13 पद · लगभग 5 मिनट

जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता। अपने सेवक जन को, सुख संपति दाता॥

सुंदर चीर सुनहरी, मां धारण कीन्हो। हीरा पन्ना दमके, तन श्रृंगार लीन्हो॥

गेरू लाल छटा छवि, बदन कमल सोहे। मंद हंसत करुणामयी, त्रिभुवन जन मोहे॥

स्वर्ण सिंहासन बैठी, चंवर दुरे प्यारे। धूप, दीप, मधु, मेवा, भोग धरें न्यारे॥

गुड़ अरु चना परम प्रिय, तामें संतोष कियो। संतोषी कहलाई, भक्तन वैभव दियो॥

शुक्रवार प्रिय मानत, आज दिवस सोही। भक्त मंडली छाई, कथा सुनत मोही॥

मंदिर जग मग ज्योति, मंगल ध्वनि छाई। विनय करें हम बालक, चरनन सिर नाई॥

भक्ति भावमय पूजा, अंगीकृत कीजै। जो मन बसे हमारे, इच्छा फल दीजै॥

दुखी, दरिद्री, रोगी, संकटमुक्त किए। बहु धनधान्य भरे घर, सुख सौभाग्य दिए॥

ध्यान धर्यो जिस जन ने, मनवांछित फल पायो। पूजा कथा श्रवण कर, घर आनंद आयो॥

शरण गहे की लज्जा, राखियो जगदंबे। संकट तू ही निवारे, दयामयी अंबे॥

संतोषी मां की आरती, जो कोई नर गावे। ऋद्धि-सिद्धि सुख संपत्ति, जी भरकर पावे॥

जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता। अपने सेवक जन को, सुख संपति दाता॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

संतोषी माता की आरती किस दिन करें?

शुक्रवार को, जो संतोषी माता का दिन माना जाता है। व्रत की कथा सुनने के बाद और गुड़-चने का भोग लगाकर यह आरती गाई जाती है।

संतोषी माता के व्रत में क्या नहीं करना चाहिए?

परंपरा के अनुसार व्रत वाले दिन खट्टी चीज़ें न खाई जाती हैं, न किसी को दी जाती हैं। गुड़ और भुने चने का भोग लगाया जाता है।

सोलह शुक्रवार के बाद क्या करते हैं?

सोलह शुक्रवार पूरे होने पर उद्यापन किया जाता है — कथा, आरती और बच्चों को भोजन कराकर व्रत पूरा किया जाता है।

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