जय संतोषी माता आरती — अर्थ सहित
'जय संतोषी माता' संतोष और सुख देने वाली माँ संतोषी की आरती है। इसमें उनके सुनहरे वस्त्र, गुड़-चने के प्रिय भोग और शुक्रवार के व्रत का वर्णन है। शुक्रवार के व्रत में कथा सुनने के बाद और सोलह शुक्रवार के उद्यापन पर यह आरती गाई जाती है।
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता। अपने सेवक जन को, सुख संपति दाता॥
सुंदर चीर सुनहरी, मां धारण कीन्हो। हीरा पन्ना दमके, तन श्रृंगार लीन्हो॥
गेरू लाल छटा छवि, बदन कमल सोहे। मंद हंसत करुणामयी, त्रिभुवन जन मोहे॥
स्वर्ण सिंहासन बैठी, चंवर दुरे प्यारे। धूप, दीप, मधु, मेवा, भोग धरें न्यारे॥
गुड़ अरु चना परम प्रिय, तामें संतोष कियो। संतोषी कहलाई, भक्तन वैभव दियो॥
शुक्रवार प्रिय मानत, आज दिवस सोही। भक्त मंडली छाई, कथा सुनत मोही॥
मंदिर जग मग ज्योति, मंगल ध्वनि छाई। विनय करें हम बालक, चरनन सिर नाई॥
भक्ति भावमय पूजा, अंगीकृत कीजै। जो मन बसे हमारे, इच्छा फल दीजै॥
दुखी, दरिद्री, रोगी, संकटमुक्त किए। बहु धनधान्य भरे घर, सुख सौभाग्य दिए॥
ध्यान धर्यो जिस जन ने, मनवांछित फल पायो। पूजा कथा श्रवण कर, घर आनंद आयो॥
शरण गहे की लज्जा, राखियो जगदंबे। संकट तू ही निवारे, दयामयी अंबे॥
संतोषी मां की आरती, जो कोई नर गावे। ऋद्धि-सिद्धि सुख संपत्ति, जी भरकर पावे॥
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता। अपने सेवक जन को, सुख संपति दाता॥
अर्थ
पद 1
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता। अपने सेवक जन को, सुख संपति दाता॥
हे संतोषी माता, आपकी जय हो। आप अपने सेवकों को सुख और समृद्धि देती हैं।
पद 2
सुंदर चीर सुनहरी, मां धारण कीन्हो। हीरा पन्ना दमके, तन श्रृंगार लीन्हो॥
माँ ने सुंदर सुनहरी साड़ी पहनी है। हीरे और पन्ने चमक रहे हैं और उन्होंने सुंदर श्रृंगार किया है।
पद 3
गेरू लाल छटा छवि, बदन कमल सोहे। मंद हंसत करुणामयी, त्रिभुवन जन मोहे॥
गेरुए-लाल रंग की आभा है और कमल जैसा मुख शोभा देता है। करुणा से भरी माँ मंद-मंद मुस्कुराती हैं और तीनों लोकों को मोह लेती हैं।
पद 4
स्वर्ण सिंहासन बैठी, चंवर दुरे प्यारे। धूप, दीप, मधु, मेवा, भोग धरें न्यारे॥
माँ सोने के सिंहासन पर बैठी हैं और उन पर सुंदर चँवर डुलाए जा रहे हैं। धूप, दीप, शहद और मेवों का अनोखा भोग रखा गया है।
पद 5
गुड़ अरु चना परम प्रिय, तामें संतोष कियो। संतोषी कहलाई, भक्तन वैभव दियो॥
गुड़ और चना माँ को सबसे प्रिय हैं, और वे इतने साधारण भोग से ही संतुष्ट हो जाती हैं। इसीलिए वे संतोषी कहलाईं और भक्तों को वैभव दिया।
पद 6
शुक्रवार प्रिय मानत, आज दिवस सोही। भक्त मंडली छाई, कथा सुनत मोही॥
माँ को शुक्रवार प्रिय है, और आज वही दिन है। भक्तों की मंडली जुटी है और सब कथा सुनकर मगन हैं।
पद 7
मंदिर जग मग ज्योति, मंगल ध्वनि छाई। विनय करें हम बालक, चरनन सिर नाई॥
मंदिर में ज्योति जगमगा रही है और मंगल ध्वनि गूँज रही है। हम बच्चे आपके चरणों में सिर झुकाकर विनती करते हैं।
पद 8
भक्ति भावमय पूजा, अंगीकृत कीजै। जो मन बसे हमारे, इच्छा फल दीजै॥
हमारी भक्ति भाव से की गई पूजा स्वीकार कीजिए। हमारे मन में जो इच्छा है, उसका फल दीजिए।
पद 9
दुखी, दरिद्री, रोगी, संकटमुक्त किए। बहु धनधान्य भरे घर, सुख सौभाग्य दिए॥
आपने दुखी, गरीब और रोगी लोगों को संकट से मुक्त किया। उनके घर धन-धान्य से भर दिए और सुख-सौभाग्य दिया।
पद 10
ध्यान धर्यो जिस जन ने, मनवांछित फल पायो। पूजा कथा श्रवण कर, घर आनंद आयो॥
जिसने भी आपका ध्यान किया, उसे मनचाहा फल मिला। पूजा करके और कथा सुनकर घर में आनंद आया।
पद 11
शरण गहे की लज्जा, राखियो जगदंबे। संकट तू ही निवारे, दयामयी अंबे॥
हे जगदंबा, जो आपकी शरण में आया है उसकी लाज रखिए। हे दयामयी अंबे, आप ही संकट दूर करती हैं।
पद 12
संतोषी मां की आरती, जो कोई नर गावे। ऋद्धि-सिद्धि सुख संपत्ति, जी भरकर पावे॥
जो कोई संतोषी माँ की यह आरती गाता है, उसे ऋद्धि-सिद्धि, सुख और संपत्ति भरपूर मिलती है।
पद 13
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता। अपने सेवक जन को, सुख संपति दाता॥
अंत में टेक फिर गाई जाती है — हे संतोषी माता, आपकी जय हो।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
संतोषी माता की आरती किस दिन करें?
शुक्रवार को, जो संतोषी माता का दिन माना जाता है। व्रत की कथा सुनने के बाद और गुड़-चने का भोग लगाकर यह आरती गाई जाती है।
संतोषी माता के व्रत में क्या नहीं करना चाहिए?
परंपरा के अनुसार व्रत वाले दिन खट्टी चीज़ें न खाई जाती हैं, न किसी को दी जाती हैं। गुड़ और भुने चने का भोग लगाया जाता है।
सोलह शुक्रवार के बाद क्या करते हैं?
सोलह शुक्रवार पूरे होने पर उद्यापन किया जाता है — कथा, आरती और बच्चों को भोजन कराकर व्रत पूरा किया जाता है।