सुखकर्ता दुःखहर्ता गणपति आरती — अर्थ सहित

'सुखकर्ता दुःखहर्ता' संत समर्थ रामदास (17वीं सदी) की लिखी मराठी आरती है। कहा जाता है कि उन्होंने इसे मोरगाँव के मयूरेश्वर गणपति के दर्शन के बाद रचा। महाराष्ट्र में और पूरे देश में गणेशोत्सव के दस दिनों में यह आरती सबसे पहले और सबसे ज़ोर से गाई जाती है।

3 पद व टेक · लगभग 4 मिनट

सुखकर्ता दुःखहर्ता वार्ता विघ्नाची। नुरवी पुरवी प्रेम कृपा जयाची। सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची। कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची॥

जय देव जय देव जय मंगलमूर्ती। दर्शनमात्रे मनकामना पुरती॥ जय देव जय देव॥

रत्नखचित फरा तुज गौरीकुमरा। चंदनाची उटी कुंकुमकेशरा। हिरेजडित मुकुट शोभतो बरा। रुणझुणती नूपुरे चरणी घागरिया॥

लंबोदर पीतांबर फणिवरबंधना। सरळ सोंड वक्रतुंड त्रिनयना। दास रामाचा वाट पाहे सदना। संकटी पावावे निर्वाणी रक्षावे सुरवरवंदना॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

'सुखकर्ता दुःखहर्ता' किसने लिखी?

यह आरती 17वीं सदी के संत समर्थ रामदास ने मराठी में लिखी। अंतिम पद में 'दास रामाचा' उन्हीं की ओर संकेत है।

यह आरती कब गाई जाती है?

गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक गणेशोत्सव में सुबह-शाम, हर संकष्टी चतुर्थी पर, और महाराष्ट्र में किसी भी पूजा की शुरुआत में।

यह आरती किस भाषा में है?

यह मराठी में है, पर देवनागरी में लिखी होने से हिंदी भाषी भक्त भी इसे आसानी से पढ़ और गा लेते हैं।

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