गणेश चालीसा — अर्थ सहित

श्री गणेश चालीसा विघ्नहर्ता गणेश जी की स्तुति है। इसमें उनके रूप का वर्णन, उनके जन्म और गज-मुख मिलने की कथा, और माता-पिता की परिक्रमा से प्रथम पूज्य बनने की कथा है। अंत में रामसुंदर का नाम आता है। बुधवार और गणेश चतुर्थी पर इसका पाठ विशेष माना जाता है।

38 चौपाई, 3 दोहे · लगभग 8 मिनट

॥ दोहा ॥

जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल। विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

॥ चौपाई ॥

जय जय जय गणपति गणराजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥

॥ चौपाई ॥

जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥

॥ चौपाई ॥

वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥

॥ चौपाई ॥

राजत मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥

॥ चौपाई ॥

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥

॥ चौपाई ॥

सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥

॥ चौपाई ॥

धनि शिव सुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व-विख्याता॥

॥ चौपाई ॥

ऋद्धि सिद्धि तव चंवर सुधारे। मूषक वाहन सोहत द्वारे॥

॥ चौपाई ॥

कहौं जन्म शुभ कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगलकारी॥

॥ चौपाई ॥

एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हा भारी॥

॥ चौपाई ॥

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुंच्यो तुम धरि द्विज रूपा॥

॥ चौपाई ॥

अतिथि जानि कै गौरी सुखारी। बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥

॥ चौपाई ॥

अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥

॥ चौपाई ॥

मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला। बिना गर्भ धारण यहि काला॥

॥ चौपाई ॥

गणनायक गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम रूप भगवाना॥

॥ चौपाई ॥

अस कहि अन्तर्धान रूप ह्वै। पलना पर बालक स्वरूप ह्वै॥

॥ चौपाई ॥

बनि शिशु रुदन जबहिं तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥

॥ चौपाई ॥

सकल मगन सुखमंगल गावहिं। नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं॥

॥ चौपाई ॥

शम्भु उमा बहुदान लुटावहिं। सुर मुनिजन सुत देखन आवहिं॥

॥ चौपाई ॥

लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आये शनि राजा॥

॥ चौपाई ॥

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं। बालक देखन चाहत नाहीं॥

॥ चौपाई ॥

गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो। उत्सव मोर न शनि तुहि भायो॥

॥ चौपाई ॥

कहन लगे शनि मन सकुचाई। का करिहौ शिशु मोहि दिखाई॥

॥ चौपाई ॥

नहिं विश्वास उमा उर भयऊ। शनि सों बालक देखन कहऊ॥

॥ चौपाई ॥

पडतहिं शनि दृग कोण प्रकाशा। बालक सिर उड़ि गयो अकाशा॥

॥ चौपाई ॥

गिरिजा गिरीं विकल ह्वै धरणी। सो दुख दशा गयो नहिं वरणी॥

॥ चौपाई ॥

हाहाकार मच्यो कैलाशा। शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा॥

॥ चौपाई ॥

तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो। काटि चक्र सो गज शिर लाये॥

॥ चौपाई ॥

बालक के धड़ ऊपर धारयो। प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥

॥ चौपाई ॥

नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे। प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे॥

॥ चौपाई ॥

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥

॥ चौपाई ॥

चले षडानन भरमि भुलाई। रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई॥

॥ चौपाई ॥

चरण मातु-पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥

॥ चौपाई ॥

धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे। नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥

॥ चौपाई ॥

तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई। शेष सहस मुख सकै न गाई॥

॥ चौपाई ॥

मैं मतिहीन मलीन दुखारी। करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी॥

॥ चौपाई ॥

भजत रामसुन्दर प्रभुदासा। जग प्रयाग ककरा दुर्वासा॥

॥ चौपाई ॥

अब प्रभु दया दीन पर कीजै। अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै॥

॥ दोहा ॥

श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान। नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सनमान॥

॥ दोहा ॥

सम्वत अपन सहस्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश। पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गणेश चालीसा कब पढ़नी चाहिए?

इसे किसी भी दिन पढ़ सकते हैं। परंपरा में बुधवार, हर महीने की चतुर्थी (विशेषकर संकष्टी) और गणेश चतुर्थी के दस दिन शुभ माने जाते हैं। कोई नया काम शुरू करने से पहले भी लोग इसका पाठ करते हैं।

गणेश चालीसा का पाठ कैसे करें?

स्नान के बाद गणेश जी के सामने दीप जलाएँ, दूर्वा, फूल या मोदक चढ़ाएँ और शांत मन से पाठ करें। अंत में आरती 'जय गणेश जय गणेश देवा' गाना आम परंपरा है।

गणेश चालीसा पढ़ने से क्या लाभ माना जाता है?

गणेश जी को विघ्नहर्ता और बुद्धि के देवता माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि श्रद्धा से पाठ करने पर बाधाएँ दूर होती हैं, मन स्थिर होता है और काम में शुभ शुरुआत होती है। चालीसा के अंतिम दोहे में घर में मंगल और सम्मान की बात कही गई है।

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