सरस्वती चालीसा — अर्थ सहित

सरस्वती चालीसा विद्या, वाणी और कला की देवी माँ सरस्वती की स्तुति है। इसमें बताया गया है कि वाल्मीकि, कालिदास, तुलसी और सूर जैसे कवियों ने माँ की कृपा से ही यश पाया। अंत में रामसागर का नाम आता है। बसंत पंचमी पर और पढ़ाई शुरू करने से पहले इसका पाठ विशेष रूप से किया जाता है।

39 चौपाई, 4 दोहे · लगभग 8 मिनट

॥ दोहा ॥

जनक जननि पद्मरज, निज मस्तक पर धरि। बन्दौं मातु सरस्वती, बुद्धि बल दे दातारि॥

॥ दोहा ॥

पूर्ण जगत में व्याप्त तव, महिमा अमित अनंतु। दुष्टजनों के पाप को, मातु तु ही अब हन्तु॥

॥ चौपाई ॥

जय श्री सकल बुद्धि बलरासी। जय सर्वज्ञ अमर अविनाशी॥

॥ चौपाई ॥

जय जय जय वीणाकर धारी। करती सदा सुहंस सवारी॥

॥ चौपाई ॥

रूप चतुर्भुज धारी माता। सकल विश्व अन्दर विख्याता॥

॥ चौपाई ॥

जग में पाप बुद्धि जब होती। तब ही धर्म की फीकी ज्योति॥

॥ चौपाई ॥

तब ही मातु का निज अवतारी। पाप हीन करती महतारी॥

॥ चौपाई ॥

वाल्मीकिजी थे हत्यारा। तव प्रसाद जानै संसारा॥

॥ चौपाई ॥

रामचरित जो रचे बनाई। आदि कवि की पदवी पाई॥

॥ चौपाई ॥

कालिदास जो भये विख्याता। तेरी कृपा दृष्टि से माता॥

॥ चौपाई ॥

तुलसी सूर आदि विद्वाना। भये और जो ज्ञानी नाना॥

॥ चौपाई ॥

तिन्ह न और रहेउ अवलम्बा। केवल कृपा आपकी अम्बा॥

॥ चौपाई ॥

करहु कृपा सोइ मातु भवानी। दुखित दीन निज दासहि जानी॥

॥ चौपाई ॥

पुत्र करहिं अपराध बहूता। तेहि न धरई चित माता॥

॥ चौपाई ॥

राखु लाज जननि अब मेरी। विनय करउं भांति बहु तेरी॥

॥ चौपाई ॥

मैं अनाथ तेरी अवलंबा। कृपा करउ जय जय जगदंबा॥

॥ चौपाई ॥

मधुकैटभ जो अति बलवाना। बाहुयुद्ध विष्णु से ठाना॥

॥ चौपाई ॥

समर हजार पाँच में घोरा। फिर भी मुख उनसे नहीं मोरा॥

॥ चौपाई ॥

मातु सहाय कीन्ह तेहि काला। बुद्धि विपरीत भई खलहाला॥

॥ चौपाई ॥

तेहि ते मृत्यु भई खल केरी। पुरवहु मातु मनोरथ मेरी॥

॥ चौपाई ॥

चंड मुण्ड जो थे विख्याता। क्षण महु संहारे उन माता॥

॥ चौपाई ॥

रक्त बीज से समरथ पापी। सुरमुनि हृदय धरा सब काँपी॥

॥ चौपाई ॥

काटेउ सिर जिमि कदली खम्बा। बारबार बिनवउं जगदंबा॥

॥ चौपाई ॥

जगप्रसिद्ध जो शुंभनिशुंभा। क्षण में बाँधे ताहि तू अम्बा॥

॥ चौपाई ॥

भरतमातु बुद्धि फेरेऊ जाई। रामचन्द्र बनवास कराई॥

॥ चौपाई ॥

एहिविधि रावण वध तू कीन्हा। सुर नरमुनि सबको सुख दीन्हा॥

॥ चौपाई ॥

को समरथ तव यश गुन गाना। निगम अनादि अनंत बखाना॥

॥ चौपाई ॥

विष्णु रुद्र जस कहिन मारी। जिनकी हो तुम रक्षाकारी॥

॥ चौपाई ॥

रक्त दन्तिका और शताक्षी। नाम अपार है दानव भक्षी॥

॥ चौपाई ॥

दुर्गम काज धरा पर कीन्हा। दुर्गा नाम सकल जग लीन्हा॥

॥ चौपाई ॥

दुर्ग आदि हरनी तू माता। कृपा करहु जब जब सुखदाता॥

॥ चौपाई ॥

नृप कोपित को मारन चाहे। कानन में घेरे मृग नाहे॥

॥ चौपाई ॥

सागर मध्य पोत के भंजे। अति तूफान नहिं कोऊ संगे॥

॥ चौपाई ॥

भूत प्रेत बाधा या दुःख में। हो दरिद्र अथवा संकट में॥

॥ चौपाई ॥

नाम जपे मंगल सब होई। संशय इसमें करई न कोई॥

॥ चौपाई ॥

पुत्रहीन जो आतुर भाई। सबै छांड़ि पूजें एहि भाई॥

॥ चौपाई ॥

करै पाठ नित यह चालीसा। होय पुत्र सुन्दर गुण ईशा॥

॥ चौपाई ॥

धूपादिक नैवेद्य चढ़ावै। संकट रहित अवश्य हो जावै॥

॥ चौपाई ॥

भक्ति मातु की करैं हमेशा। निकट न आवै ताहि कलेशा॥

॥ चौपाई ॥

बंदी पाठ करें सत बारा। बंदी पाश दूर हो सारा॥

॥ चौपाई ॥

रामसागर बाँधि हेतु भवानी। कीजै कृपा दास निज जानी॥

॥ दोहा ॥

मातु सूर्य कान्ति तव, अन्धकार मम रूप। डूबन से रक्षा करहु, परूँ न मैं भव कूप॥

॥ दोहा ॥

बलबुद्धि विद्या देहु मोहि, सुनहु सरस्वती मातु। राम सागर अधम को, आश्रय तू ही देदातु॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सरस्वती चालीसा कब पढ़नी चाहिए?

बसंत पंचमी माँ सरस्वती का मुख्य पर्व है, उस दिन इसका पाठ विशेष शुभ माना जाता है। बहुत से विद्यार्थी रोज़ सुबह पढ़ाई शुरू करने से पहले, या परीक्षा के दिनों में भी इसका पाठ करते हैं। गुरुवार को भी कई लोग पढ़ते हैं।

सरस्वती चालीसा का पाठ कैसे करें?

स्नान के बाद माँ के चित्र के सामने दीप जलाएँ, सफ़ेद या पीले फूल चढ़ाएँ, और अपनी किताबें या वाद्य पास रखकर शांत मन से पाठ करें। पाठ के बाद कुछ देर पढ़ाई या अभ्यास करना अच्छी परंपरा है।

क्या सरस्वती चालीसा पढ़ने से पढ़ाई में मदद मिलती है?

भक्तों का विश्वास है कि श्रद्धा से पाठ करने पर मन एकाग्र होता है और माँ की कृपा से बुद्धि खुलती है। पर यह मेहनत की जगह नहीं लेता — परंपरा कहती है कि माँ उन्हीं की मदद करती हैं जो लगन से सीखते हैं।

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