या कुन्देन्दुतुषारहारधवला — सरस्वती वंदना अर्थ सहित

यह विद्या, कला और वाणी की देवी माँ सरस्वती की सबसे प्रसिद्ध वंदना है। भारत के कई स्कूलों में सुबह की प्रार्थना में और बसंत पंचमी पर इसे गाया जाता है। इसमें माँ के उजले रूप, वीणा और कमल का वर्णन है, और प्रार्थना है कि वे हमारी जड़ता (आलस और अज्ञान) दूर करें।

2 श्लोक · लगभग 2 मिनट

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना। या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥

शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद्व्यापिनीं वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्। हस्ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

सरस्वती वंदना कब गाई जाती है?

स्कूल की सुबह की प्रार्थना में, पढ़ाई शुरू करने से पहले, परीक्षा के दिनों में और विशेष रूप से बसंत पंचमी (सरस्वती पूजा) पर।

इसे कितनी बार पढ़ना चाहिए?

रोज़ एक बार पढ़ना काफ़ी है। चाहें तो पहला श्लोक 3 या 11 बार भी बोल सकते हैं।

'निःशेषजाड्यापहा' का क्या अर्थ है?

'जाड्य' यानी जड़ता — आलस, सुस्ती और अज्ञान। 'निःशेषजाड्यापहा' यानी जो इसे पूरी तरह दूर कर दें। यह विद्यार्थियों की सबसे बड़ी प्रार्थना है।

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