उत्तम चरित्र · अध्याय 11
नारायणी स्तुति और देवी के वरदान
अब तक की कहानी
"मैं अकेली हूँ" कहकर देवी ने सब शक्तियाँ अपने में समेट लीं और शुंभ का अंत कर दिया। संसार में शांति लौट आई।
ग्यारहवें अध्याय में शुंभ के अंत के बाद अग्नि को आगे करके इंद्र और सभी देवता आनंद से खिले चेहरों के साथ देवी की स्तुति करने लगे। इसे स्तुति कहते हैं, क्योंकि इसके बहुत से श्लोक 'नारायणि नमोऽस्तु ते' — 'हे नारायणी, आपको नमस्कार' — पर समाप्त होते हैं।
देवताओं ने कहा — 'हे देवी, आप शरण में आए लोगों का दुख दूर करती हैं। आप ही सृष्टि, पालन और संहार करने वाली शक्ति हैं। आप ही सब मंगलों का भी मंगल हैं।' उन्होंने मातृकाओं के हर रूप को भी नमस्कार किया — हंस पर बैठी ब्रह्माणी से लेकर चक्र धारण करने वाली वैष्णवी तक।
प्रसन्न होकर देवी ने कहा, 'वर माँगो।' देवताओं ने माँगा, 'हे अखिलेश्वरी, तीनों लोकों की सब बाधाओं को इसी तरह शांत करती रहें और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहें।' देवी ने वचन दिया कि वे आगे भी समय-समय पर अवतार लेंगी।
देवी ने बताया — 'वैवस्वत मन्वंतर के अट्ठाईसवें युग में शुंभ-निशुंभ फिर पैदा होंगे। तब मैं नंद गोप के घर यशोदा के गर्भ से जन्म लेकर विंध्याचल पर रहूँगी और उनका अंत करूँगी।' उन्होंने आगे के रूप भी बताए — रक्तदंतिका, सौ आँखों वाली शताक्षी, अन्न और साग से संसार का पालन करने वाली शाकंभरी, दुर्गम असुर का अंत करने वाली दुर्गा, भीमा और भ्रामरी।
अंत में देवी ने सबसे बड़ा वचन दिया — 'जब-जब दानवों के कारण संसार में बाधा आएगी, तब-तब मैं लेकर शत्रुओं का नाश करूँगी।' यह सुनकर देवताओं के मन में निश्चिंतता भर गई। भक्त आज भी इस वचन को देवी का भरोसा मानकर याद करते हैं।
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
हे सब मंगलों की भी मंगल, कल्याण करने वाली, हर उद्देश्य पूरा करने वाली, शरण देने वाली, तीन नेत्रों वाली गौरी नारायणी — आपको नमस्कार।
— दुर्गा सप्तशती, अध्याय 11
आज के जीवन में सीख
देवी का वचन है कि वे बार-बार आएँगी। इसका अर्थ है कि अंधेरा कितना भी गहरा हो, अच्छाई हार नहीं मानती — बस हमें आशा नहीं छोड़नी चाहिए।
सभी अध्याय
- 1राजा सुरथ, समाधि वैश्य और मधु-कैटभ
- 2महिषासुर का आतंक और देवी का प्रकट होना
- 3महिषासुर का अंत
- 4देवताओं की स्तुति और देवी का वरदान
- 5शुंभ-निशुंभ और दूत का संदेश
- 6धूम्रलोचन का अंत
- 7चंड-मुंड और माँ चामुंडा
- 8रक्तबीज का अंत
- 9निशुंभ का अंत
- 10"मैं अकेली हूँ" — शुंभ का अंत
- 11नारायणी स्तुति और देवी के वरदान
- 12देवी का वचन — इस कथा की महिमा
- 13सुरथ और समाधि को वरदान