उत्तम चरित्र · अध्याय 8
रक्तबीज का अंत
अब तक की कहानी
देवी के माथे से प्रकट माँ काली ने चंड-मुंड का अंत किया और 'चामुंडा' नाम पाया। अब शुंभ अपनी पूरी सेना भेजता है।
आठवें अध्याय में चंड-मुंड के अंत की खबर सुनकर शुंभ ने असुरों के सभी कुलों को युद्ध के लिए भेज दिया। देवी ने धनुष की टंकार की, सिंह ने गर्जना की और काली ने अपनी आवाज़ से दिशाएँ भर दीं। तभी देवताओं की रक्षा के लिए ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु, इंद्र आदि की शक्तियाँ उन्हीं के रूप और वाहन लेकर प्रकट हुईं।
ब्रह्माणी हंस पर, माहेश्वरी बैल पर, कौमारी मोर पर, वैष्णवी गरुड़ पर, वाराही, नारसिंही और ऐंद्री हाथी पर आईं। इन्हें कहते हैं। फिर चंडिका के शरीर से एक अत्यंत उग्र शक्ति निकली, जिसने भगवान शिव को दूत बनाकर शुंभ के पास भेजा — इसलिए वे 'शिवदूती' कहलाईं। संदेश था: 'स्वर्ग लौटा दो और पाताल चले जाओ, नहीं तो युद्ध करो।'
असुरों ने युद्ध चुना और मातृकाओं ने उन्हें भगा दिया। तब रक्तबीज नाम का असुर आया। उसे वरदान था कि उसके रक्त की जितनी बूँदें धरती पर गिरेंगी, उतने ही नए रक्तबीज पैदा हो जाएँगे। जब भी देवियाँ उस पर वार करतीं, नए-नए रक्तबीज खड़े हो जाते, और पूरा रणक्षेत्र उन्हीं से भर गया।
देवता घबरा गए। तब चंडिका ने काली से कहा, 'चामुंडे, अपना मुख फैलाओ। मेरे शस्त्रों से जो बूँदें गिरें, उन्हें धरती पर गिरने से पहले ही पी जाओ, ताकि नए असुर पैदा न हों।' काली ने ऐसा ही किया। अब कोई नया रक्तबीज जन्म नहीं ले सका।
धीरे-धीरे रक्तबीज की शक्ति खत्म हो गई और चंडिका ने उसका अंत कर दिया। देवताओं ने राहत की साँस ली और खुशी से नाचने लगे। मातृकाएँ भी विजय के आनंद में झूम उठीं। पर शुंभ और निशुंभ अब भी बचे थे, और उनका क्रोध पहले से भी बढ़ गया था।
आज के जीवन में सीख
कुछ बुरी आदतें रक्तबीज जैसी होती हैं — एक को काटो तो दस उग आती हैं। उन्हें जड़ से रोकना पड़ता है, ताकि वे फिर से न उगें।
सभी अध्याय
- 1राजा सुरथ, समाधि वैश्य और मधु-कैटभ
- 2महिषासुर का आतंक और देवी का प्रकट होना
- 3महिषासुर का अंत
- 4देवताओं की स्तुति और देवी का वरदान
- 5शुंभ-निशुंभ और दूत का संदेश
- 6धूम्रलोचन का अंत
- 7चंड-मुंड और माँ चामुंडा
- 8रक्तबीज का अंत
- 9निशुंभ का अंत
- 10"मैं अकेली हूँ" — शुंभ का अंत
- 11नारायणी स्तुति और देवी के वरदान
- 12देवी का वचन — इस कथा की महिमा
- 13सुरथ और समाधि को वरदान