कर्पूरगौरं करुणावतारं — मंत्र अर्थ सहित
यह भगवान शिव की एक सुंदर स्तुति है, जो लगभग हर घर और मंदिर में आरती के अंत में गाई जाती है। इसमें शिव जी के कपूर जैसे गोरे रूप, उनकी करुणा और माता पार्वती के साथ उनके निवास का वर्णन है। भक्त प्रार्थना करते हैं कि शिव-पार्वती सदा उनके हृदय में रहें।
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥
अर्थ
पद 1
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥
जो कपूर जैसे गोरे हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार का सार हैं और नागराज को हार की तरह पहनते हैं — जो सदा हृदय-कमल में बसते हैं, उन भगवान शिव को माता भवानी सहित मैं प्रणाम करता हूँ।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कर्पूरगौरं मंत्र कब बोला जाता है?
आमतौर पर किसी भी आरती के अंत में, आरती की थाली घुमाने के बाद। सोमवार और शिवरात्रि पर शिव पूजा में भी इसे बोला जाता है।
इसे कितनी बार बोलना चाहिए?
आरती के बाद एक बार बोलना परंपरा है। कुछ भक्त शिव ध्यान के लिए इसे 11 या 108 बार भी बोलते हैं।
'कर्पूरगौरं' का अर्थ क्या है?
'कर्पूर' यानी कपूर और 'गौर' यानी गोरा — कपूर जैसे उजले और पवित्र शिव। कपूर जलकर कुछ नहीं छोड़ता, इसे पवित्रता का प्रतीक माना जाता है।