हनुमान स्तवन (प्रनवउँ पवनकुमार) — अर्थ सहित
हनुमान स्तवन छोटी-सी स्तुति है, जो अक्सर हनुमान चालीसा से पहले गाई जाती है। इसकी शुरुआत रामचरितमानस के बालकांड के सोरठे 'प्रनवउँ पवनकुमार' से होती है, फिर 'अतुलितबलधामं' जैसे प्रसिद्ध संस्कृत श्लोक आते हैं। मंगलवार और शनिवार की पूजा में इसका पाठ आम है।
॥ दोहा ॥
प्रनवउँ पवनकुमार, खल बन पावक ग्यानघन। जासु हृदय आगार, बसहिं राम सर चाप धर॥
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
गोष्पदीकृतवारीशं मशकीकृतराक्षसम्। रामायणमहामालारत्नं वन्देऽनिलात्मजम्॥
अञ्जनानन्दनं वीरं जानकीशोकनाशनम्। कपीशमक्षहन्तारं वन्दे लङ्काभयङ्करम्॥
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥
आञ्जनेयमतिपाटलाननं काञ्चनाद्रिकमनीयविग्रहम्। पारिजाततरुमूलवासिनं भावयामि पवमाननन्दनम्॥
यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम्। बाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तकम्॥
अर्थ
दोहा
प्रनवउँ पवनकुमार, खल बन पावक ग्यानघन। जासु हृदय आगार, बसहिं राम सर चाप धर॥
मैं पवनपुत्र हनुमान जी को प्रणाम करता हूँ, जो दुष्ट रूपी वन को जलाने वाली आग हैं और ज्ञान से भरे हैं, और जिनके हृदय रूपी घर में धनुष-बाण धारण किए श्रीराम बसते हैं।
पद 1
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
अतुलनीय बल के धाम, सोने के पर्वत जैसे चमकते शरीर वाले, राक्षस रूपी वन के लिए अग्नि, ज्ञानियों में सबसे आगे, सब गुणों के भंडार, वानरों के स्वामी, श्रीराम के प्रिय भक्त पवनपुत्र को मैं नमन करता हूँ।
पद 2
गोष्पदीकृतवारीशं मशकीकृतराक्षसम्। रामायणमहामालारत्नं वन्देऽनिलात्मजम्॥
जिन्होंने समुद्र को गाय के खुर के गड्ढे जितना छोटा बना दिया, राक्षसों को मच्छर जैसा तुच्छ कर दिया, और जो रामायण रूपी बड़ी माला के रत्न हैं — उन पवनपुत्र को मैं प्रणाम करता हूँ।
पद 3
अञ्जनानन्दनं वीरं जानकीशोकनाशनम्। कपीशमक्षहन्तारं वन्दे लङ्काभयङ्करम्॥
अंजनी के पुत्र, वीर, सीता जी का शोक दूर करने वाले, वानरों के स्वामी, अक्षय कुमार को मारने वाले और लंका को भयभीत करने वाले हनुमान जी को मैं प्रणाम करता हूँ।
पद 4
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥
मन जैसी गति और वायु जैसे वेग वाले, इंद्रियों को जीतने वाले, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, पवनपुत्र, वानर सेना के प्रमुख, श्रीराम के दूत की मैं शरण लेता हूँ।
पद 5
आञ्जनेयमतिपाटलाननं काञ्चनाद्रिकमनीयविग्रहम्। पारिजाततरुमूलवासिनं भावयामि पवमाननन्दनम्॥
अंजनी-पुत्र, गुलाबी-लाल मुख वाले, सोने के पर्वत जैसे सुंदर शरीर वाले, पारिजात वृक्ष के नीचे निवास करने वाले पवनपुत्र का मैं ध्यान करता हूँ।
पद 6
यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम्। बाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तकम्॥
जहाँ-जहाँ श्रीराम का कीर्तन होता है, वहाँ-वहाँ सिर पर हाथ जोड़े, आँखों में प्रेम के आँसू भरे हनुमान जी उपस्थित रहते हैं। राक्षसों का अंत करने वाले उन मारुति को नमन करो।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
हनुमान स्तवन कब पढ़ा जाता है?
आमतौर पर हनुमान चालीसा या सुंदरकांड के पाठ से पहले, और मंगलवार-शनिवार की पूजा में। इसे सुबह या शाम किसी भी समय पढ़ा जा सकता है।
'प्रनवउँ पवनकुमार' कहाँ से है?
यह गोस्वामी तुलसीदास के रामचरितमानस के बालकांड का सोरठा है। 'अतुलितबलधामं' श्लोक सुंदरकांड के आरंभ में आता है; बाकी श्लोक परंपरा से प्रचलित संस्कृत स्तुतियाँ हैं।
क्या हनुमान स्तवन और हनुमान चालीसा एक ही हैं?
नहीं। हनुमान स्तवन कुछ श्लोकों की छोटी स्तुति है, जबकि हनुमान चालीसा में 40 चौपाइयाँ और दोहे हैं। कई भक्त दोनों को साथ पढ़ते हैं।