मधुराष्टकम् (अधरं मधुरं) — अर्थ सहित

मधुराष्टकम् श्री वल्लभाचार्य की रची हुई श्रीकृष्ण की प्रेम भरी स्तुति है। इसमें बताया गया है कि मधुरता के स्वामी कृष्ण का सब कुछ मीठा है — उनके होंठ, मुस्कान, बाँसुरी, चाल, सखा, गायें और लीलाएँ। इसे जन्माष्टमी, भजन-संध्या और रोज़ की कृष्ण पूजा में गाया जाता है।

8 श्लोक · लगभग 4 मिनट

अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम्। हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्॥१॥

वचनं मधुरं चरितं मधुरं वसनं मधुरं वलितं मधुरम्। चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्॥२॥

वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ। नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्॥३॥

गीतं मधुरं पीतं मधुरं भुक्तं मधुरं सुप्तं मधुरम्। रूपं मधुरं तिलकं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्॥४॥

करणं मधुरं तरणं मधुरं हरणं मधुरं रमणं मधुरम्। वमितं मधुरं शमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्॥५॥

गुञ्जा मधुरा माला मधुरा यमुना मधुरा वीची मधुरा। सलिलं मधुरं कमलं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्॥६॥

गोपी मधुरा लीला मधुरा युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरम्। दृष्टं मधुरं शिष्टं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्॥७॥

गोपा मधुरा गावो मधुरा यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा। दलितं मधुरं फलितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्॥८॥

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

मधुराष्टकम् किसने लिखा?

श्री वल्लभाचार्य ने, जो पुष्टिमार्ग के संस्थापक और 15वीं-16वीं सदी के महान कृष्ण-भक्त आचार्य थे।

'मधुराधिपति' का क्या अर्थ है?

'मधुरता के अधिपति' यानी मिठास के स्वामी — श्रीकृष्ण। कुछ लोग इसे 'मथुरा के स्वामी' से भी जोड़ते हैं, पर मुख्य भाव मधुरता का है।

मधुराष्टकम् कब गाना चाहिए?

इसे किसी भी समय गाया जा सकता है — सुबह की पूजा, शाम की आरती या भजन में। जन्माष्टमी और कार्तिक मास में इसे विशेष प्रेम से गाया जाता है।

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