गायत्री चालीसा — अर्थ सहित
गायत्री चालीसा वेदमाता गायत्री की हिंदी स्तुति है, जिसमें दो आरंभिक दोहे, चालीस चौपाइयाँ और एक समापन दोहा हैं। इसमें गायत्री मंत्र के चौबीस अक्षरों की महिमा और माँ के ज्ञानमय रूप का वर्णन है। भक्त इसे प्रायः सुबह या संध्या के समय, गायत्री मंत्र के जप के साथ पढ़ते हैं।
॥ दोहा ॥
ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा, जीवन ज्योति प्रचण्ड। शान्ति कान्ति जागृत प्रगति, रचना शक्ति अखण्ड॥
॥ दोहा ॥
जगत जननि मंगल करनि, गायत्री सुखधाम। प्रणवों सावित्री स्वधा, स्वाहा पूरन काम॥
॥ चौपाई ॥
भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी। गायत्री नित कलिमल दहनी॥
॥ चौपाई ॥
अक्षर चौविस परम पुनीता। इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता॥
॥ चौपाई ॥
शाश्वत सतोगुणी सत रूपा। सत्य सनातन सुधा अनूपा॥
॥ चौपाई ॥
हंसारूढ़ सितम्बर धारी। स्वर्ण कान्ति शुचि गगन-बिहारी॥
॥ चौपाई ॥
पुस्तक पुष्प कमण्डलु माला। शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला॥
॥ चौपाई ॥
ध्यान धरत पुलकित हित होई। सुख उपजत दुःख दुर्मति खोई॥
॥ चौपाई ॥
कामधेनु तुम सुर तरु छाया। निराकार की अद्भुत माया॥
॥ चौपाई ॥
तुम्हरी शरण गहै जो कोई। तरै सकल संकट सों सोई॥
॥ चौपाई ॥
सरस्वती लक्ष्मी तुम काली। दिपै तुम्हारी ज्योति निराली॥
॥ चौपाई ॥
तुम्हरी महिमा पार न पावैं। जो शारद शत मुख गुन गावैं॥
॥ चौपाई ॥
चार वेद की मात पुनीता। तुम ब्रह्माणी गौरी सीता॥
॥ चौपाई ॥
महामन्त्र जितने जग माहीं। कोउ गायत्री सम नाहीं॥
॥ चौपाई ॥
सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै। आलस पाप अविद्या नासै॥
॥ चौपाई ॥
सृष्टि बीज जग जननि भवानी। कालरात्रि वरदा कल्याणी॥
॥ चौपाई ॥
ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते। तुम सों पावें सुरता तेते॥
॥ चौपाई ॥
तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे। जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे॥
॥ चौपाई ॥
महिमा अपरम्पार तुम्हारी। जय जय जय त्रिपदा भयहारी॥
॥ चौपाई ॥
पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना। तुम सम अधिक न जग में आना॥
॥ चौपाई ॥
तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा। तुमहिं पाय कछु रहै न कलेशा॥
॥ चौपाई ॥
जानत तुमहिं तुमहिं ह्वै जाई। पारस परसि कुधातु सुहाई॥
॥ चौपाई ॥
तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई। माता तुम सब ठौर समाई॥
॥ चौपाई ॥
ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड घनेरे। सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे॥
॥ चौपाई ॥
सकल सृष्टि की प्राण विधाता। पालक पोषक नाशक त्राता॥
॥ चौपाई ॥
मातेश्वरी दया व्रत धारी। तुम सन तरे पातकी भारी॥
॥ चौपाई ॥
जापर कृपा तुम्हारी होई। तापर कृपा करें सब कोई॥
॥ चौपाई ॥
मंद बुद्धि ते बुधि बल पावें। रोगी रोग रहित हो जावें॥
॥ चौपाई ॥
दरिद्र मिटै कटै सब पीरा। नाशै दुःख हरै भव भीरा॥
॥ चौपाई ॥
गृह क्लेश चित चिन्ता भारी। नासै गायत्री भय हारी॥
॥ चौपाई ॥
सन्तति हीन सुसन्तति पावें। सुख संपति युत मोद मनावें॥
॥ चौपाई ॥
भूत पिशाच सबै भय खावें। यम के दूत निकट नहिं आवें॥
॥ चौपाई ॥
जो सधवा सुमिरें चित लाई। अछत सुहाग सदा सुखदाई॥
॥ चौपाई ॥
घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी। विधवा रहें सत्य व्रत धारी॥
॥ चौपाई ॥
जयति जयति जगदम्ब भवानी। तुम सम और दयालु न दानी॥
॥ चौपाई ॥
जो सतगुरु सों दीक्षा पावे। सो साधन को सफल बनावे॥
॥ चौपाई ॥
सुमिरन करे सुरुचि बड़भागी। लहै मनोरथ गृही विरागी॥
॥ चौपाई ॥
अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता। सब समर्थ गायत्री माता॥
॥ चौपाई ॥
ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी। आरत अर्थी चिन्तित भोगी॥
॥ चौपाई ॥
जो जो शरण तुम्हारी आवें। सो सो मन वांछित फल पावें॥
॥ चौपाई ॥
बल बुधि विद्या शील स्वभाउ। धन वैभव यश तेज उछाउ॥
॥ चौपाई ॥
सकल बढ़ें उपजें सुख नाना। जे यह पाठ करै धरि ध्याना॥
॥ दोहा ॥
यह चालीसा भक्ति युत, पाठ करै जो कोय। तापर कृपा प्रसन्नता, गायत्री की होय॥
अर्थ
दोहा
ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा, जीवन ज्योति प्रचण्ड। शान्ति कान्ति जागृत प्रगति, रचना शक्ति अखण्ड॥
हे माँ गायत्री, आप ह्रीं, श्रीं, क्लीं बीज मंत्रों का स्वरूप हैं। आप बुद्धि, तेज और जीवन की प्रचंड ज्योति हैं; आप शांति, सौंदर्य, जागृति, उन्नति और सृजन की अखंड शक्ति हैं।
दोहा
जगत जननि मंगल करनि, गायत्री सुखधाम। प्रणवों सावित्री स्वधा, स्वाहा पूरन काम॥
हे जगत की माता, मंगल करने वाली, सुख की धाम गायत्री! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आप ही सावित्री, स्वधा और स्वाहा हैं और कामनाएँ पूरी करने वाली हैं।
चौपाई 1
भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी। गायत्री नित कलिमल दहनी॥
हे माँ, आप 'ॐ भूर्भुवः स्वः' से युक्त हैं। हे गायत्री, आप कलियुग के मैल को सदा जलाकर नष्ट करती हैं।
चौपाई 2
अक्षर चौविस परम पुनीता। इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता॥
गायत्री मंत्र के चौबीस अक्षर परम पवित्र हैं। इन्हीं में शास्त्र, वेद और गीता का सार बसा है।
चौपाई 3
शाश्वत सतोगुणी सत रूपा। सत्य सनातन सुधा अनूपा॥
आप शाश्वत हैं, सत्त्वगुण से भरी और सत्य का स्वरूप हैं। आप सनातन सत्य और अनुपम अमृत हैं।
चौपाई 4
हंसारूढ़ सितम्बर धारी। स्वर्ण कान्ति शुचि गगन-बिहारी॥
आप हंस पर सवार हैं और श्वेत वस्त्र धारण करती हैं। आपकी कांति सोने जैसी है; आप पवित्र हैं और आकाश में विचरती हैं।
चौपाई 5
पुस्तक पुष्प कमण्डलु माला। शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला॥
आपके हाथों में पुस्तक, फूल, कमंडल और माला है। आपका शरीर उजला है और आँखें बड़ी-बड़ी हैं।
चौपाई 6
ध्यान धरत पुलकित हित होई। सुख उपजत दुःख दुर्मति खोई॥
आपका ध्यान करते ही मन पुलकित हो उठता है और भला होता है। सुख उत्पन्न होता है और दुख व बुरी बुद्धि मिट जाती है।
चौपाई 7
कामधेनु तुम सुर तरु छाया। निराकार की अद्भुत माया॥
आप कामधेनु गाय और कल्पवृक्ष की छाया के समान हैं। आप निराकार परमात्मा की अद्भुत शक्ति हैं।
चौपाई 8
तुम्हरी शरण गहै जो कोई। तरै सकल संकट सों सोई॥
जो कोई आपकी शरण लेता है, वह सारे संकटों से पार हो जाता है।
चौपाई 9
सरस्वती लक्ष्मी तुम काली। दिपै तुम्हारी ज्योति निराली॥
आप ही सरस्वती, लक्ष्मी और काली हैं। आपकी अनोखी ज्योति चारों ओर चमकती है।
चौपाई 10
तुम्हरी महिमा पार न पावैं। जो शारद शत मुख गुन गावैं॥
यदि सरस्वती सौ मुखों से भी आपके गुण गाएँ, तब भी आपकी महिमा का अंत नहीं पा सकतीं।
चौपाई 11
चार वेद की मात पुनीता। तुम ब्रह्माणी गौरी सीता॥
आप चारों वेदों की पवित्र माता हैं। आप ही ब्रह्माणी, गौरी और सीता हैं।
चौपाई 12
महामन्त्र जितने जग माहीं। कोउ गायत्री सम नाहीं॥
संसार में जितने भी महामंत्र हैं, उनमें से कोई भी गायत्री के समान नहीं है।
चौपाई 13
सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै। आलस पाप अविद्या नासै॥
आपका स्मरण करते ही हृदय में ज्ञान का प्रकाश होता है और आलस, पाप और अज्ञान नष्ट होते हैं।
चौपाई 14
सृष्टि बीज जग जननि भवानी। कालरात्रि वरदा कल्याणी॥
आप सृष्टि का बीज, जगत की माता भवानी हैं। आप ही कालरात्रि, वर देने वाली और कल्याण करने वाली हैं।
चौपाई 15
ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते। तुम सों पावें सुरता तेते॥
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और जितने भी देवता हैं, वे सब अपना देवत्व आपसे ही पाते हैं।
चौपाई 16
तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे। जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे॥
आप भक्तों की हैं और भक्त आपके हैं। जैसे माँ को पुत्र प्राणों से भी प्यारा होता है, वैसे ही भक्त आपको प्रिय हैं।
चौपाई 17
महिमा अपरम्पार तुम्हारी। जय जय जय त्रिपदा भयहारी॥
आपकी महिमा अपार है। हे तीन चरणों वाली (त्रिपदा) गायत्री, भय हरने वाली, आपकी जय हो, जय हो, जय हो।
चौपाई 18
पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना। तुम सम अधिक न जग में आना॥
आप सारे ज्ञान और विज्ञान से भरी हैं। संसार में आपके समान या आपसे बढ़कर और कोई नहीं।
चौपाई 19
तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा। तुमहिं पाय कछु रहै न कलेशा॥
आपको जान लेने पर जानने को कुछ शेष नहीं रहता, और आपको पा लेने पर कोई क्लेश बाकी नहीं रहता।
चौपाई 20
जानत तुमहिं तुमहिं ह्वै जाई। पारस परसि कुधातु सुहाई॥
जो आपको जान लेता है, वह आपके जैसा ही हो जाता है — जैसे पारस पत्थर छूकर साधारण धातु भी सोना बन जाती है।
चौपाई 21
तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई। माता तुम सब ठौर समाई॥
आपकी शक्ति हर जगह चमकती है। हे माता, आप हर स्थान में समाई हुई हैं।
चौपाई 22
ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड घनेरे। सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे॥
अनगिनत ग्रह, नक्षत्र और ब्रह्मांड आपकी प्रेरणा से ही गतिमान हैं।
चौपाई 23
सकल सृष्टि की प्राण विधाता। पालक पोषक नाशक त्राता॥
आप सारी सृष्टि को प्राण देने वाली हैं। आप ही पालन, पोषण, संहार और रक्षा करने वाली हैं।
चौपाई 24
मातेश्वरी दया व्रत धारी। तुम सन तरे पातकी भारी॥
हे मातेश्वरी, आपने दया करने का व्रत लिया है। आपकी कृपा से बड़े-बड़े पापी भी तर गए।
चौपाई 25
जापर कृपा तुम्हारी होई। तापर कृपा करें सब कोई॥
जिस पर आपकी कृपा होती है, उस पर सभी कृपा करते हैं।
चौपाई 26
मंद बुद्धि ते बुधि बल पावें। रोगी रोग रहित हो जावें॥
चालीसा कहती है कि आपकी कृपा से कम बुद्धि वाले भी बुद्धि और बल पाते हैं, और रोगी रोग से मुक्त हो जाते हैं।
चौपाई 27
दरिद्र मिटै कटै सब पीरा। नाशै दुःख हरै भव भीरा॥
आपकी कृपा से दरिद्रता मिटती है, सब पीड़ा कटती है, दुख नष्ट होता है और संसार का भय दूर होता है।
चौपाई 28
गृह क्लेश चित चिन्ता भारी। नासै गायत्री भय हारी॥
घर के झगड़े और मन की भारी चिंता को भय हरने वाली गायत्री माँ दूर कर देती हैं।
चौपाई 29
सन्तति हीन सुसन्तति पावें। सुख संपति युत मोद मनावें॥
चालीसा के अनुसार संतानहीन लोग अच्छी संतान पाते हैं, और सुख-संपत्ति के साथ आनंद मनाते हैं।
चौपाई 30
भूत पिशाच सबै भय खावें। यम के दूत निकट नहिं आवें॥
भूत-पिशाच सब आपसे डरते हैं, और यमराज के दूत भी आपके भक्त के पास नहीं आते।
चौपाई 31
जो सधवा सुमिरें चित लाई। अछत सुहाग सदा सुखदाई॥
जो विवाहित स्त्रियाँ मन लगाकर आपका स्मरण करती हैं, उनका सौभाग्य अटल और सदा सुखदायी रहता है।
चौपाई 32
घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी। विधवा रहें सत्य व्रत धारी॥
कुमारी कन्याएँ सुख देने वाला घर और वर पाती हैं, और विधवाएँ सत्य और व्रत के मार्ग पर दृढ़ रहती हैं।
चौपाई 33
जयति जयति जगदम्ब भवानी। तुम सम और दयालु न दानी॥
हे जगदंबा भवानी, आपकी जय हो, जय हो। आपके समान कोई और दयालु और दानी नहीं है।
चौपाई 34
जो सतगुरु सों दीक्षा पावे। सो साधन को सफल बनावे॥
जो सच्चे गुरु से दीक्षा पाता है, वह अपनी साधना को सफल बनाता है।
चौपाई 35
सुमिरन करे सुरुचि बड़भागी। लहै मनोरथ गृही विरागी॥
जो भाग्यशाली व्यक्ति प्रेम से आपका स्मरण करता है — चाहे गृहस्थ हो या वैरागी — उसकी मनोकामना पूरी होती है।
चौपाई 36
अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता। सब समर्थ गायत्री माता॥
गायत्री माता आठ सिद्धियों और नौ निधियों को देने वाली और सब कुछ करने में समर्थ हैं।
चौपाई 37
ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी। आरत अर्थी चिन्तित भोगी॥
ऋषि, मुनि, संन्यासी, तपस्वी, योगी, दुखी, धन चाहने वाले, चिंतित और सांसारिक सुख भोगने वाले —
चौपाई 38
जो जो शरण तुम्हारी आवें। सो सो मन वांछित फल पावें॥
— इनमें से जो-जो आपकी शरण में आता है, वह अपना मनचाहा फल पाता है।
चौपाई 39
बल बुधि विद्या शील स्वभाउ। धन वैभव यश तेज उछाउ॥
बल, बुद्धि, विद्या, अच्छा स्वभाव, धन, वैभव, यश, तेज और उत्साह —
चौपाई 40
सकल बढ़ें उपजें सुख नाना। जे यह पाठ करै धरि ध्याना॥
— ये सब बढ़ते हैं और अनेक सुख मिलते हैं, उस व्यक्ति को जो ध्यान लगाकर यह पाठ करता है।
दोहा
यह चालीसा भक्ति युत, पाठ करै जो कोय। तापर कृपा प्रसन्नता, गायत्री की होय॥
जो कोई भक्ति के साथ इस चालीसा का पाठ करता है, उस पर गायत्री माँ की कृपा और प्रसन्नता होती है।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
इसके बाद पढ़ें
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गायत्री चालीसा कब पढ़नी चाहिए?
इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है। परंपरा से सुबह सूर्योदय के समय या संध्या के समय, स्नान के बाद पाठ करना अच्छा माना जाता है। गायत्री जयंती और नवरात्रि में इसका विशेष पाठ होता है।
गायत्री चालीसा और गायत्री मंत्र में क्या अंतर है?
गायत्री मंत्र ऋग्वेद का संस्कृत मंत्र है जिसका जप माला पर किया जाता है। गायत्री चालीसा हिंदी में लिखी गई स्तुति है जो उसी देवी की महिमा गाती है। बहुत से भक्त पहले मंत्र जप और फिर चालीसा पाठ करते हैं।
गायत्री चालीसा पढ़ने का क्या महत्व है?
परंपरा में गायत्री को ज्ञान और सद्बुद्धि की देवी माना जाता है। भक्तों का विश्वास है कि इसके नियमित पाठ से मन शांत होता है, बुद्धि निर्मल होती है और अच्छे विचार आते हैं।