गजाननं भूतगणादिसेवितं — गणेश मंत्र अर्थ सहित
यह गणेश जी का बहुत प्रसिद्ध श्लोक है, जो पूजा की शुरुआत में और गणेश चतुर्थी पर गाया जाता है। इसमें गणेश जी के हाथी जैसे मुख, उनके गणों, उनके प्रिय फलों और माता उमा (पार्वती) के पुत्र होने का वर्णन है। अंत में दुख दूर करने वाले विघ्नेश्वर के चरणों में प्रणाम किया जाता है।
गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्। उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्॥
अर्थ
पद 1
गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्। उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्॥
जिनका मुख हाथी जैसा है, जिनकी सेवा भूतगण आदि करते हैं, जो कैथ और जामुन के फल प्रेम से खाते हैं, जो माता उमा के पुत्र हैं और दुख का नाश करते हैं — उन विघ्नेश्वर गणेश जी के चरण-कमलों में मैं प्रणाम करता हूँ।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
गजाननं भूतगणादिसेवितं कब बोलें?
किसी भी पूजा की शुरुआत में, बुधवार को, गणेश चतुर्थी और संकष्टी चतुर्थी पर।
इसे कितनी बार बोलें?
पूजा में 1 या 3 बार बोलना आम है। कई भक्त इसे 11 या 108 बार भी जपते हैं।
'कपित्थ' और 'जम्बू' फल कौन-से हैं?
'कपित्थ' यानी कैथ (वुड-एप्पल) और 'जम्बू' यानी जामुन। परंपरा में ये गणेश जी के प्रिय फल माने जाते हैं।