त्वमेव माता च पिता त्वमेव — प्रार्थना अर्थ सहित
यह भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण की एक बहुत प्यारी प्रार्थना है। इसमें भक्त कहता है कि हे प्रभु, आप ही मेरे माता, पिता, बंधु, मित्र, विद्या और धन हैं — आप ही मेरे सब कुछ हैं। यह स्कूलों में, पूजा के अंत में और आरती के बाद बहुत गाई जाती है।
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव॥
अर्थ
पद 1
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव॥
हे देवों के देव! आप ही मेरी माता हैं, आप ही पिता हैं, आप ही बंधु और मित्र हैं। आप ही मेरी विद्या और धन हैं — आप ही मेरे सब कुछ हैं।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
यह प्रार्थना कब बोली जाती है?
पूजा या आरती के अंत में, सुबह की प्रार्थना में, और किसी भी समय जब मन भगवान को याद करना चाहे।
इसे कितनी बार बोलें?
एक बार भाव से बोलना ही पर्याप्त है। चाहें तो 3 बार भी बोल सकते हैं।
यह श्लोक किस ग्रंथ से है?
यह श्लोक परंपरा में 'पांडव गीता' (प्रपन्न गीता) नामक प्रार्थना-संग्रह में मिलता है। यह किसी एक देवता के लिए नहीं, हर इष्ट देव के लिए बोला जा सकता है।