ॐ जय श्री विश्वकर्मा आरती — अर्थ सहित
भगवान विश्वकर्मा को देवताओं का शिल्पी और सृष्टि का वास्तुकार माना जाता है। परंपरा के अनुसार उन्होंने द्वारका, इंद्रपुरी और देवताओं के अस्त्र बनाए। कारीगर, इंजीनियर, कारखाने और दुकानदार विश्वकर्मा पूजा (आमतौर पर 17 सितंबर) पर औज़ारों और मशीनों की पूजा करके यह आरती गाते हैं।
ॐ जय श्री विश्वकर्मा, प्रभु जय श्री विश्वकर्मा। सकल सृष्टि के कर्ता, रक्षक श्रुति धर्मा॥
आदि सृष्टि में विधि को, श्रुति उपदेश दिया। जीव मात्र का जग में, ज्ञान विकास किया॥
ऋषि अंगिरा ने तप से, शांति नहीं पाई। ध्यान किया जब प्रभु का, सकल सिद्धि आई॥
रोग ग्रस्त राजा ने, जब आश्रय लीना। संकट मोचन बनकर, दूर दुख कीना॥
जब रथकार दम्पती, तुमरी टेर करी। सुनकर दीन प्रार्थना, विपत्ति हरी सगरी॥
एकानन चतुरानन, पंचानन राजे। द्विभुज चतुर्भुज दशभुज, सकल रूप साजे॥
ध्यान धरे जब पद का, सकल सिद्धि आवे। मन दुविधा मिट जावे, अटल शक्ति पावे॥
विश्वकर्मा जी की आरती, जो कोई नर गावे। कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥
अर्थ
पद 1
ॐ जय श्री विश्वकर्मा, प्रभु जय श्री विश्वकर्मा। सकल सृष्टि के कर्ता, रक्षक श्रुति धर्मा॥
हे प्रभु विश्वकर्मा, आपकी जय हो। आप पूरी सृष्टि के रचने वाले और वेदों के धर्म के रक्षक हैं।
पद 2
आदि सृष्टि में विधि को, श्रुति उपदेश दिया। जीव मात्र का जग में, ज्ञान विकास किया॥
सृष्टि के आरंभ में आपने ब्रह्मा जी को वेदों का ज्ञान दिया, और संसार के सब जीवों के ज्ञान का विकास किया।
पद 3
ऋषि अंगिरा ने तप से, शांति नहीं पाई। ध्यान किया जब प्रभु का, सकल सिद्धि आई॥
ऋषि अंगिरा को तपस्या से भी शांति नहीं मिली; जब उन्होंने प्रभु का ध्यान किया, तब उन्हें सब सिद्धियाँ मिल गईं।
पद 4
रोग ग्रस्त राजा ने, जब आश्रय लीना। संकट मोचन बनकर, दूर दुख कीना॥
जब एक रोगी राजा ने आपकी शरण ली, तो आपने संकट हरने वाले बनकर उसका दुख दूर किया।
पद 5
जब रथकार दम्पती, तुमरी टेर करी। सुनकर दीन प्रार्थना, विपत्ति हरी सगरी॥
जब रथ बनाने वाले एक पति-पत्नी ने आपको पुकारा, तो उनकी दीन प्रार्थना सुनकर आपने उनकी सारी विपत्ति हर ली।
पद 6
एकानन चतुरानन, पंचानन राजे। द्विभुज चतुर्भुज दशभुज, सकल रूप साजे॥
आप एक मुख, चार मुख और पाँच मुख वाले रूपों में शोभा पाते हैं। दो, चार और दस भुजाओं वाले — सब रूप आप पर सजते हैं।
पद 7
ध्यान धरे जब पद का, सकल सिद्धि आवे। मन दुविधा मिट जावे, अटल शक्ति पावे॥
भक्त मानते हैं कि आपके चरणों का ध्यान करने से सब सिद्धियाँ मिलती हैं, मन की दुविधा मिटती है और अटल शक्ति मिलती है।
पद 8
विश्वकर्मा जी की आरती, जो कोई नर गावे। कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पावे॥
जो भी इस आरती को गाता है, उसे मन की इच्छा का फल मिलता है — ऐसा शिवानंद स्वामी कहते हैं।
अर्थ कथामंत्र टीम ने सरल भाषा में लिखे हैं।
इसके बाद पढ़ें
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
विश्वकर्मा पूजा कब होती है?
उत्तर और पूर्व भारत में यह आमतौर पर हर साल 17 सितंबर (कन्या संक्रांति) को होती है; कुछ जगह दिवाली के अगले दिन भी मनाई जाती है।
भगवान विश्वकर्मा कौन हैं?
वे देवताओं के शिल्पी और वास्तुकार माने जाते हैं। परंपरा में द्वारका नगरी, इंद्र का वज्र और पुष्पक विमान उनकी रचनाएँ बताई गई हैं।
विश्वकर्मा पूजा में किसकी पूजा होती है?
भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा के साथ औज़ार, मशीनें, गाड़ियाँ और काम की जगह की पूजा होती है, और फिर यह आरती गाई जाती है।