प्रेत खंड · अध्याय 7
यमलोक का मार्ग और वैतरणी नदी
अब तक की कहानी
तेरहवें दिन के बाद जीव यमदूतों के साथ यमलोक की लंबी यात्रा पर निकलता है। परिवार का दान और श्राद्ध उसके साथ जाते हैं।
भगवान विष्णु ने बताया कि यमलोक का मार्ग बहुत लंबा है। पुराण के अनुसार, इस यात्रा में लगभग एक वर्ष लगता है, और रास्ते में सोलह नगर आते हैं। इसीलिए परंपरा में मृत्यु के बाद हर महीने और साल पूरा होने पर वार्षिक श्राद्ध किया जाता है, ताकि यात्रा में जीव को भोजन और जल मिलता रहे।
पुराण इस मार्ग को कर्मों के अनुसार अलग-अलग बताता है। जिसने जीवन में प्यासे को पानी पिलाया, उसे रास्ते में जल मिलता है। जिसने छाता या जूते दान किए, उसे धूप और काँटों से बचाव मिलता है। जिसने भूखे को खिलाया, उसे भोजन मिलता है। जिसने केवल अपने लिए जिया, उसके लिए यह रास्ता कठिन हो जाता है।
इस मार्ग में एक नदी आती है जिसे कहते हैं। पुराण इसे बहुत चौड़ी और भयानक नदी बताता है, जिसे पार करना पापी के लिए बहुत कठिन होता है। पर यही नदी पुण्यात्मा के लिए शांत और सहज हो जाती है। यह वर्णन हमें याद दिलाता है कि एक ही रास्ता हमारे कर्मों के कारण आसान या कठिन बनता है।
पुराण कहता है कि जिसने जीवन में गौदान किया, या जिसके नाम से परिवार ने श्रद्धा से गौदान किया, उसे वैतरणी पार करने में सहायता मिलती है। आज बहुत-से परिवार गौशाला में सेवा या दान करके इस परंपरा को निभाते हैं। भाव यह है कि जीवों पर दया ही नदी पार कराने वाली नाव है।
यह सब सुनकर किसी परिवार को डरना नहीं चाहिए। ये वर्णन हमें यह सिखाने के लिए हैं कि दया, दान और सच्चाई ही इस यात्रा के साथी हैं। जो प्रेम आपने अपने प्रियजन से पाया, और जो भलाई उन्होंने दूसरों के लिए की — वही उनके रास्ते की छाया और जल है।
आज के जीवन में सीख
आज किया गया हर छोटा उपकार — किसी को पानी देना, किसी की मदद करना — कल की यात्रा का सहारा है।
सभी अध्याय
- 1गरुड़ पुराण क्या है और मृत्यु के बाद क्यों पढ़ा जाता है
- 2गरुड़ जी के प्रश्न
- 3मृत्यु के समय क्या होता है
- 4शरीर छोड़ने के बाद आत्मा
- 5दस दिन का पिंडदान
- 6ग्यारहवाँ, बारहवाँ और तेरहवाँ दिन
- 7यमलोक का मार्ग और वैतरणी नदी
- 8यमराज का दरबार और चित्रगुप्त
- 9कर्म और उसका फल
- 10वे पुण्य कर्म जो साथ जाते हैं
- 11श्राद्ध और पितर
- 12प्रेत योनि और परिवार की सहायता
- 13पुनर्जन्म
- 14मोक्ष का मार्ग
- 15अच्छा जीवन कैसे जियें — गरुड़ पुराण का संदेश