विद्येश्वर संहिता · अध्याय 2
अनंत ज्योति स्तंभ — ब्रह्मा और विष्णु
अब तक की कहानी
सूत जी ने ऋषियों को शिव पुराण का परिचय दिया। अब वे सृष्टि की शुरुआत की एक अद्भुत घटना सुनाते हैं।
एक बार सृष्टि करने वाले ब्रह्मा जी और पालन करने वाले विष्णु जी के बीच बहस छिड़ गई — हम दोनों में बड़ा कौन है? बात इतनी बढ़ी कि दोनों युद्ध के लिए तैयार हो गए। देवता घबरा गए, क्योंकि दो महान शक्तियों का टकराव पूरी सृष्टि को हिला सकता था।
तभी दोनों के बीच अचानक एक विशाल अग्नि का स्तंभ प्रकट हुआ। वह इतना तेजस्वी था कि आँखें चौंधिया जाएँ। न उसका आरंभ दिखता था, न अंत। दोनों चकित हो गए और तय किया — जो इस का छोर पहले खोज लेगा, वही बड़ा माना जाएगा।
विष्णु जी वराह यानी सूअर का रूप लेकर नीचे की ओर चले, और ब्रह्मा जी हंस बनकर ऊपर उड़े। युगों तक चलते रहे, पर किसी को अंत नहीं मिला। विष्णु जी विनम्रता से लौट आए और मान लिया कि यह स्तंभ अनंत है।
ब्रह्मा जी को ऊपर से गिरता हुआ केतकी का एक फूल मिला। उन्होंने फूल को अपने साथ झूठी गवाही के लिए मना लिया और लौटकर कहा कि मैंने छोर देख लिया है। तभी स्तंभ से भगवान शिव प्रकट हुए। उन्होंने विष्णु जी की सच्चाई की प्रशंसा की और ब्रह्मा जी के झूठ पर क्रोध किया।
शिव के क्रोध से ब्रह्मा जी का अहंकार टूट गया और उन्होंने क्षमा माँगी। विष्णु जी के कहने पर शिव ने उन्हें क्षमा कर दिया, पर कहा कि झूठी गवाही देने वाला केतकी का फूल मेरी पूजा में नहीं चढ़ेगा। परंपरा कहती है कि इसी अनंत ज्योति के रूप में शिव का पहला प्रकट होना ही शिवलिंग की पूजा का आधार बना।
आज के जीवन में सीख
सच मान लेना कि मैं नहीं जानता, कोई हार नहीं है। झूठ से जीती गई जीत टिकती नहीं, पर ईमानदारी हमेशा सम्मान दिलाती है।
सभी अध्याय
- 1शिव पुराण क्या है?
- 2अनंत ज्योति स्तंभ — ब्रह्मा और विष्णु
- 3शिवलिंग की पूजा क्यों होती है?
- 4सती और दक्ष का यज्ञ
- 5वीरभद्र और दक्ष के यज्ञ का विनाश
- 6तारकासुर का वरदान और कामदेव का भस्म होना
- 7पार्वती की तपस्या
- 8शिव-पार्वती विवाह
- 9कार्तिकेय का जन्म और तारकासुर वध
- 10गणेश का जन्म और हाथी का सिर
- 11त्रिपुरासुर और एक बाण
- 12नीलकंठ — जब शिव ने विष पिया
- 13गंगा का अवतरण — शिव की जटा में
- 14मार्कंडेय और काल पर विजय
- 15किरात और अर्जुन
- 16शिव के रूप — अर्धनारीश्वर और नटराज
- 17शिकारी और पहली शिवरात्रि
- 18बारह ज्योतिर्लिंग — भाग 1
- 19बारह ज्योतिर्लिंग — भाग 2